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सौदा नहीं किया कभी अपने जमीर का

सीमित संसाधनों के साथ

महती भौतिकता वादी प्यास की तृप्ति

शायद प्रेरित करती है तुम्हे सतत

बेच देने के लिए अपना जमीर ......

शराब और शबाब में मस्त

अपने दांतों से खींचते हुए

रोस्टेड चिकेन की टाँगे

भूलते रहे हो तुम अपने शक्ति और अधिकार ...

फिर  समाज में रुतवा कायम करने की;

एक अच्छा पिता और पति कहलाने की ;

तुम्हारी ख्वाइश ने भी जी भर हवा दी है  

अधिक से अधिक धनोपार्जन की तुम्हारी प्यास को

जायज या नाजायज

किसी भी तरीके से , कैसे भी ...

अपने और अपनों के अनंत सुखों की चाह में

नोटों से भरे लिफाफों के बदले

तुमने जीभर सौदा किया है

अपनी माँ का ; अपनी मातृभूमि का ….

लेकिन न जाने क्यूँ मुझे

आज भी लगता है की

अनंत गुना कम हैं तुम्हारे सुख उस सुख से

जो मिलता है

सूखी रोटी खाने में;

घास के बिछोने पे सोने में;

उसे और सिर्फ उसे ....

जिसने कभी नहीं भुलाए हैं अपने शक्ति और अधिकार

बेचा नहीं है मातृभूमि को

सौदा नहीं किया कभी  अपने जमीर का 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 20, 2013 at 12:10am

प्रयासरत रहें आदरनीय .. सादर

Comment by ram shiromani pathak on December 16, 2013 at 9:40pm

सुन्दर भावाभिव्यक्ति आदरणीय आशुतोष जी। ।   हार्दिक बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 15, 2013 at 9:42pm

जो मिलता है

सूखी रोटी खाने में;

घास के बिछोने पे सोने में;

उसे और सिर्फ उसे ....

जिसने कभी नहीं भुलाए हैं अपने शक्ति और अधिकार

बेचा नहीं है मातृभूमि को

सौदा नहीं किया कभी  अपने जमीर का  ------------ आदरणीय आशुतोष भाई , बहुत सही बात कही है , आपको हार्दिक बधाई ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 15, 2013 at 7:36pm

अच्छी भावाव्यक्ति है आदरणीय डॉ आशुतोष सर बधाई आपको

Comment by coontee mukerji on December 15, 2013 at 6:48pm

जो मिलता है

सूखी रोटी खाने में;

घास के बिछोने पे सोने में;

उसे और सिर्फ उसे ....

जिसने कभी नहीं भुलाए हैं अपने शक्ति और अधिकार

बेचा नहीं है मातृभूमि को

सौदा नहीं किया कभी  अपने जमीर का ...........अति सुंदर.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 15, 2013 at 2:37pm

आशुतोष जी /मित्रवर

बड़ा ही भावपूर्ण  है आपका कथ्य

आत्मभिमान और आत्मगौरव के साथ

सूखी रोटी का स्वाद  i  राना प्रताप  जी याद् आ गए i

Comment by savitamishra on December 14, 2013 at 7:17pm

जायज या नाजायज

किसी भी तरीके से , कैसे भी ...

अपने और अपनों के अनंत सुखों की चाह में

नोटों से भरे लिफाफों के बदले

तुमने जीभर सौदा किया है.............सुन्दर

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