2112 2112 2112 112
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दाग चंदा को लगे हैं, सूरज का क्या गया
ढूँढ लेगा रात को वो, फिर से कोई घर नया
बादलों को थी मनाही , कैसे करते बारिसें
उसके सूखे दामनों पर, आँसुओं ने की दया
कौन बोले, किसको बोले, इस सियासत में बुरा
सब हमामों के चरित्तर, शेष किसमें है हया
बाज के थे सहायक चील , कौवे औ’ उलूक
फिर अकेली बाज से, कब तलक लड़ती बया
सोच का पिछडे़ हुए में, था बुजुर्गों का लिहाज
आधुनिक होकर ‘मुसाफिर’, हो गया वो बेहया
"मौलिक व अप्रकाशित"
Comment
आ0 लक्ष्मण जी गजल के भाव तो अच्छे हैं , परंतु आ0 अरुण जी बात पर भी गौर करना जरूरी हो जाता है , क्योंकि आपकी गजल मे काफिया नहीं दिखता । आप स्वयम भी एक बार देख लें ।
आदरणीय लक्ष्मण जी मेरे हिसाब आपकी ग़ज़ल में काफिया ही नहीं है इस लिहाज से आपकी ग़ज़ल ख़ारिज हो जाती है. एक बार आप भी गौर फरमाएं.
अच्छी गज़ल, बधाई लक्ष्मण भाई॥
दाग चंदा को लगे हैं, surya का par क्या गया
ढूँढ लेगा रात को वो, फिर से कोई घर नया
baaki sher behad khas huye hain.
आदरणीय लक्ष्मण भाई , गज़ल के भाव और विचार बहुत अच्छे लगे , आपको बधाइयाँ ॥ बह्र मे गड़्बड़ी लग रही है , एक बात और तक्तीअ कर देखें ॥ जैसे - दाग चंदा / को लगे हैं,/ सूरज का /क्या गया
2122 या 2121 / 2112 / 222 / 112 ---- एक बात तक्तीअ बाक़ी मिसरों का भी कर के देख लें ॥
कौन बोले, किसको बोले, इस सियासत में बुरा
सब हमामों के चरित्तर, शेष किसमें है हया
आदरणीय लक्ष्मण जी बहुत खूब ..........उम्दा गज़ल के लिए बधाई
धामी जी
बहुत सुन्दर ग़ज़ल i बधाई हो i
बादलों को थी मनाही , कैसे करते बारिसें
उसके सूखे दामनों पर, आँसुओं ने की दया..wah!..wah!
सब हमामों के चरित्तर, शेष किसमें है हया..bebak bayani..laxman dhami ji..
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