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ये दुनिया धर्मशाला है (ग़ज़ल )

हैं  कपड़े  साफ  सुथरे  से , पड़ा  काँधे  दुशाला  है
शहर  में भेडि़यों  ने आ, बदल  अब  रूप  डाला है


कहानी  रोज  पापों की, उघड़  कर  सामने  आती
किसी ने  झूठ  बोला था, ये  दुनिया  धर्मशाला है

समझ के आम जैसे ही, आमजन चूसे जाते नित
बनी ये सियासत अब, महज भ्रष्टों  की  खाला है


मथोगे गर मिलेगा नित, यहाँ अमृत भी पीने को
है सिन्धु सम जीवन, कहो मत विष का प्याला है

किया सुबह  शाम झगड़ा , रखी वाणी  में दुत्कारें
'मुसाफिर' हमने ही सुख को, दिया घर निकाला है

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
मौलिक व अप्रकाशित


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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 23, 2013 at 1:22pm

भाई अविनाश जी एवं मीना बहन ,

ग़ज़ल कि प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ,

वस्तुतः अभी बहुत कुछ अभी सीखना बांकी है . आप जैसे प्रबुद्ध जनों के आशीष और मार्गदर्शन की आकांक्षा है .

Comment by Meena Pathak on December 23, 2013 at 11:56am

बहुत सुन्दर गज़ल ,, बधाई आप को

Comment by AVINASH S BAGDE on December 23, 2013 at 11:33am

मथोगे गर मिलेगा नित, यहाँ अमृत भी पीने को
है सिन्धु सम जीवन, कहो मत विष का प्याला है

he!'मुसाफिर' tumane ye umda kah dala hai...

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