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दोहे : शुभ-नूतन की बाट // -सौरभ

प्रतिपल नव की कल्पना, पल-व्यतीत आधार  
सामासिक दृढ़ भाव ले,  आह्लादित संसार  

सिद्धि प्रदायक वर्ष नव : धर्म-कर्म-शुभ-अर्थ
मंशा कुत्सित दानवी, लब्धसिद्धि हित व्यर्थ

शाश्वत मनस स्वभाव से नूतन नवल स्वरूप
खेल रही मृदु ओस में खिलखिल करती धूप  

आओ मिलजुल तय करें, हमसब निज संसार
स्वीकारें उत्साह पल, जीयें मधुमय प्यार   

आँखें : उम्मीदें तरल, आँखें : कठिन यथार्थ
आँखें : संबल कृष्ण-सी, आँखें : मन से पार्थ

इच्छा आशा औ’ व्यथा, भाव-भावना रूप
फिरभी कुहरे में निकल, पुलक किलकती धूप  
*************

-सौरभ

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on March 31, 2014 at 5:36pm

सुन्दर शब्द चयन... सुन्दर भाव.... सुन्दर सन्देश से ओत प्रोत सुन्दर दोहावली !!!

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on January 4, 2014 at 8:56pm
आदरणीय सौरभ सर जी! अत्यंत सारगर्भित दोहावली।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 2, 2014 at 11:44pm

आदरणीय सत्यनारायणजी, दोहों को स्वीकारने के लिए आपका सदर आभार.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 2, 2014 at 11:44pm

आदरणीय विजय जी, आपका छंद प्रस्तुति पर स्वागत है. आपकी अनुभवी दृष्टि ने इन छंदों को अमोदित कर मुझे महती मान दिया है. आपका हार्दिक आभार
सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 2, 2014 at 11:44pm

डॉ. प्राची, अपने दोहों पर आपकी विज्ञ दृष्टि के लिए मैं आभारी हूँ.
शुभ-शुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 2, 2014 at 11:43pm

आदरणीय अखिलेश भाईजी, आपकी उदार प्रशंसा के लिए मेरा हृदय आभारी है.
सादर धन्यवाद आदरणीय


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 2, 2014 at 11:43pm

आदरणीया वन्दनाजी, आपको मेरा रचनाकर्म रुचिकर लगा यह मेरे लिए भी संतोष की बात है.
शुभ-शुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 2, 2014 at 11:43pm

आदरणीय गिरिराजजी, आपकी सदाशयता के प्रति मैं सदा से नत रहा हूँ. आपका हार्दिक आभार.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 2, 2014 at 11:43pm

//शब्दों का सामर्थ्य, रचना में और बलवती  हो रही है !..बहुत बढ़िया //

भाई बैद्यनाथ सारथीजी, आपकी कसौटी खरा उतरता रहूँ इस हेतु मेरा भी प्रयास निरंतर बना रहेगा. रचानाओं पर आपकी उपस्थिति आश्वस्त भी करती है.
शुभ-शुभ


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 2, 2014 at 11:34pm

//सौरभ से है वर्ष नव, सौरभ भरा प्रकर्ष i
सौरभ से है हर्ष नव ,सौरभ ही उत्कर्ष ii //


इस अप्रतिम मान के लिए आपका हृदय से आभारी हूँ, आदरणीय गोपाल नारायनजी. आपसे अपनी रचना और अपने रचनाकर्म पर निरंकुश लेखिनी की अपेक्षा है.
सादर

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