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उलझे प्रश्नों में हँसता मन

क्यूँ
हाँ क्यूँ
मेरा मन
मेरा कहा नहीं मानता
क्यूँ मेरा तन
मेरे बस में नहीं
न जाने इस पंथ का अंत क्या हो
किस इच्छा के वशीभूत हो
मेरे पाँव
अनजान उजाले की ओर आकर्षित हो
निरंतर धुल धूसरित राह पे
बढ़ते ही जा रहे हैं
ये तन
उस मन के वशीभूत है
जो स्थूल रूप में है ही नहीं
न जाने मैं इस राह पे
क्या ढूढने निकला हूँ
क्या वो
जो मैं पीछे छोड़ आया
या वो
जो मेरे मन की
गहरी कंदराओं में
छुपा बैठा है
मन के
राग-विराग, सुख-दुःख
मिलन-विरह, जीवन-मरण के प्रश्न
आज भी उत्तर की प्रतीक्षा में
मानव की बेबसी का उपहास उड़ा रहे हैं
बेलगाम घोड़े सा ये मन
अपनी इच्छा रूपी
नागफ़ास की कुंडली में
तन को उस उजाले की ओर ले जा रहा है
जो स्वयं अन्धकार के वश में है
क्या इस मन और जीवन रूपी राह का अंत निर्वाण है
शायद हाँ
शायद न
तन हारा न हारा मन
लम्बी राहें थकता जीवन
जन्म-मरण और पुनर्जन्म
उलझे प्रश्नों में हँसता मन, उलझे प्रश्नों में हँसता मन ……

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 858

Comment

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Comment by Sushil Sarna on December 28, 2013 at 2:04pm

aa.Satyam Upadhyay jee rachna par aapkee khoobsoorat wah ka haardik aabhaar

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 28, 2013 at 10:31am

मिलन-विरह, जीवन-मरण के प्रश्न
आज भी उत्तर की प्रतीक्षा में
मानव की बेबसी का उपहास उड़ा रहे हैं

बहुत गहरी बात, बधाई स्वीकारें आदरणीय शुशील जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 27, 2013 at 11:37pm

आदरणीय सुशील सरना जी बहुत अच्छी भावाभिव्यक्ति, खूबसूरत कविता है दिली मुबारकबाद स्वीकार करें

Comment by satyam upadhyay on December 27, 2013 at 10:26pm
वाह सुशील जी

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