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दिवस हो चले कोमल-कोमल (नवगीत)-कल्पना रामानी

सर्द हवा ने बिस्तर बाँधा,

दिवस हो चले कोमल-कोमल।

 

सूरज ने कुहरे को निगला।

ताप बढ़ा, कुछ पारा उछला।

हिमगिरि पिघले, सागर सँभले,

निरख नदी, बढ़ चली चंचला।

 

खुली धूप से खिलीं वादियाँ,

लगे झूमने निर्झर कल-कल।

नगमें सुना रही फुलवारी
गूँज उठी भोली किलकारी
खिलती कलियाँ देख-देखकर
भँवरों पर छा गई खुमारी।

 

देख तितलियाँ, उड़ती चिड़ियाँ,

मुस्कानों से महक रहे पल।

 

अमराई जो कल तक पल-छिन

काट रही थी बनकर जोगन,

मौसम के इस नए रूप से।

आतुर है बनने को दुल्हन।

 

मन-आँगन में नृत्य कर रहे,

मोर, पपीहे, कोयल, बुलबुल।    

मौलिक व अप्रकाशित

---कल्पना रामानी 

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 13, 2014 at 12:48pm

वाह वाह !! अतिसुंदर एवं सार्थक अभिव्यक्ति आदरणीया कल्पना रामानी जी, इस उत्कृष्ट  सृजन हेतु मेरी बहुत बहुत बधाई स्वीकार करेँ।

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 13, 2014 at 11:10am

अप्रितम नवगीत आदरणीया दिल खुश हो गया पढ़कर बहुत ही सुन्दरता प्रकृति के सुन्दर रूप का वर्णन किया है आपने मेरी ओर से ढेरों बधाई स्वीकारें.

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 12, 2014 at 5:28pm

आदरणीया आपकी रचना पढ़कर मन प्रकृति के मनोहारी दृश्य में खो गया ..मन झूम गया ..बेहद शानदार इस कृति पे सादर बधाई ..

Comment by ajay sharma on January 11, 2014 at 10:08pm

wah wah wah wah wah wah aur ab kya kahoo...........likha nahi jaye ......................

Comment by Ajay Agyat on January 11, 2014 at 7:16pm

अति सुंदर 

Comment by कल्पना रामानी on January 10, 2014 at 10:35pm

आदरणीय श्याम नरेन जी, हार्दिक आभार

Comment by कल्पना रामानी on January 10, 2014 at 10:35pm

आदरणीया मीना जी, बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on January 10, 2014 at 10:34pm

प्रोत्साहित करने के लिए सादर धन्यवाद सरिता जी

Comment by कल्पना रामानी on January 10, 2014 at 10:33pm

आदरणीय गिरिराज जी, सादर धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on January 10, 2014 at 10:32pm

आदरणीय ब्रह्मचारी जी, उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद

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