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नित्यानंदम स्तयं निरूपम (विजय निकोर)

नित्यानंदम स्तयं निरूपम  !

 

श्यामल गंभीर रात्रि

सुनता हूँ संवेदनमय स्वर

"विचारों में गुँथे, वेदना से बिंधे

अस्वीकृत एकाकी मन

तू उदास न हो"

 

टूटे संबंधों के

वीरान प्रवहमान प्रसारों में

कल की पुरानी किसी की

प्यार भरी हँसी, स्नेहमयी आँखों में

देखो, शायद सुख-शांति मिल जाए

देखो उन आँखों में, इतना न देखो

कि तुम्हें अनजाने

अज्ञात दर्द कोई और मिल जाए

 

मानवीय संबंधों का आत्मीय दर्शन

मौन में था पला, मौन में जिया

क्या हुआ कुछ तो हुआ उस मौन को

कि अब वह रहस्यमय

द्वंद्व-स्थिति में अनंत हुआ ?

 

याद है ? रात्रि-श्यामल वेला थी

मन:स्थिति को तोलती

हृदय की गाँठों को खोलती

तू कहती थी ... यह संबंध

था न दिलों का, न गिलों का

न उलझे-सुलझे खयालों का

न बँधी थी आत्मा आत्मा से

संबंध था सदैव पूर्ण-सम्पूर्ण

नित्यानंदम  स्तयं  निरूपम

 

क्षमा करो मित्र अति आत्मीय

शत शंकाओं के धुँधलके में

कठिन तथ्यों के विश्लेषण करते

आज पूछ लूँ क्या, कब क्या हुआ

नित्यानंदम स्तयं निरूपम रूठ गया ?

 

--------

-विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 650

Comment

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Comment by Sarita Bhatia on January 17, 2014 at 9:03pm

सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें 

Comment by Priyanka singh on January 17, 2014 at 8:56pm

आहा सर ...एक बार फिर में निशब्द हो गयी ....आपकी लेखनी मन के भावों कि स्याही से ओत-प्रोत है और उसमे आपके ह्रदय की कोमलता, मिठास मिल कर पाठकों को मंत्रमुग्ध कर देती है.... बहुत ही सुन्दर रचना ......बधाई सर 

Comment by Savitri Rathore on January 17, 2014 at 7:37pm

आदरणीय विजय जी,सादर नमस्कार ! आपकी रचनाओं में जो भाव -प्रवणता होती है,उसे शब्दों में निरूपित करना असम्भव है। उन्हें पढ़ते हुए ,केवल उन भावों को अनुभूत किया जा सकता है,वर्णित नहीं। अतिसुन्दर रचना!

Comment by बृजेश नीरज on January 17, 2014 at 5:40pm

बहुत सुन्दर! आपकी रचनाओं को पढना सदा एक अनोखी अनुभूति दे जाता है. इस सुन्दर रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई!

सादर!

Comment by Vindu Babu on January 17, 2014 at 9:10am
आदरणीय:
आपकी रचनाएं सदैव एक विशेष प्रवाह में बहा ले जातीं हैं...इस रचना में प्रस्तुत अन्त:संवाद अन्त:करण पर अमिट छाप डाल रहा है।
संवेदनाओं का इतनी सूक्ष्मता से विश्लेषित कर उनके चरम को स्पर्श करना...सच में बहुत आनन्ददायी होता है।
//देखो उन आँखो में,इतना न देखो
कि तुम्हे अनजाना
अज्ञात दर्द कोई और दिख जाए//

//...कुछ तो हुआ उस मौन को
कि अब वह रहस्यमय
द्वन्द्व-स्थिति में अनंत हुआ//...most touching sir.
शब्द चयन भी बहुत भाया आदरणीय।
हार्दिक आभार यह हृदयस्पर्शी रचना साझा करने के लिए।
सादर
Comment by रमेश कुमार चौहान on January 16, 2014 at 11:01pm

बहुत ही सुंदर भावपूर्ण रचना है ।  बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 16, 2014 at 10:31pm

जब अंतरबंधों में सब घालमेल होने लगे त परिस्थितियाँ अबूझ सी हो ही जाती हैं.

सादर

Comment by coontee mukerji on January 16, 2014 at 10:26pm

बहुत सुंदर....आपकी रचनाएं.. लौकिक अलौकिक गुणों  की खान होती है....सगुण  निर्गुण का संवाद...दार्शनिक सब कुछ....आदरणीय विजय जी और क्या कहूँ....ज्यादा बोलना सूरज को दीपक दिखाने के समान है.साधुवाद,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 16, 2014 at 9:58pm

आदरणीय बड़े भाई विजय जी , आत्मीय रिश्तों मे आये आंतरिक परिवर्तन और उससे उपजे प्रश्न को बहुत सुन्दरता से बयान किया है आपने , आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

Comment by Neeraj Neer on January 16, 2014 at 7:57pm

बहुत खूब सुन्दर गहन भाव .. 

कृपया ध्यान दे...

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