For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

एकलव्य का अंगूठा

संस्कृति का क्रम अटूट

पांच हज़ार वर्षों से

अनवरत घूमता

सभ्यता का

क्रूर पहिया.

दामन में छद्म ऐतिहासिक

सौन्दर्य बोध के बहाने

छुपाये दमन का खूनी दाग,

आत्माभिमान से अंधी

पांडित्य पूर्ण सांस्कृतिक गौरव का

दंभ भरती

सभ्यता.

मोहनजोदड़ो की कत्लगाह से भागे लोगों से

छिनती रही

अनवरत,

उनके अधिकार, 

किया जाता रहा वंचित,

जीने के मूलभूत अधिकार से,

कुचल कर  सम्मान

मिटा दी गयी

आदमी और पशु के बीच की

मोटी सीमा.

छीन लिया उनका भगवान भी

कर दिया स्थापित

अपने मंदिर में

बनाकर महादेव.

अपना कटा अंगूठा लिए एकलव्य

फिरता रहा जंगल जंगल

रिसता  रहा उसका खून

सदियों से वह भोग रहा है असह्य पीड़ा.

बिजलियों सी कौंध रही है

धनुष चलाने की

उसकी इच्छा है दमित .

द्रोणाचार्य की आरक्षित विद्या

देश, समाज को सदा नहीं रख सकी सुरक्षित.

यवनों ने अपनी रूक्षता के आगे

कर दिया घुटने टेकने को मजबूर.

सदियों सिजदे में झुका रहा सर.

झुके हुए सर से भी  नहीं देखा

नीचे एकलव्य के अंगूठे से रिसता खून

बंद कर लिया स्वयं को

शंख शल्क में.

खंडित शौर्य एवं अभिमान के बाद भी

एकलव्य की पीड़ा अनदेखी रही

मोहनजोदड़ो की कत्लगाह की

सीमा अब फ़ैल रही है

जंगलों , घाटियों और कंदराओं तक ,

अब पर्ण कुटियों के नीचे खोजा जा रहा है 

कीमती धातु , कोयला, लोहा, यूरेनियम , सोना.

अपनी जमीन और जंगल से किये जा रहे हैं विस्थापित

कभी भय से कभी लालच देकर ,

एकलव्य के कटे अंगूठे में अभी भी है प्राण,

अभी भी है छटपटाहट

पुनर्जीवित होने की और

खीचने की प्रत्यंचा.

एक दिन एकलव्य का अंगूठा

जुड़ जाएगा और

वह वाण पर रखकर तीर

उसी अंगूठे से खीचेगा प्रत्यंचा

और भेदेगा

द्रोणाचार्य के आत्माभिमान को

लग जाएगी आग सोने के खानों में.

.... नीरज कुमार नीर

मौलिक एवं अप्रकाशित .. 

Views: 850

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 21, 2014 at 10:32am

बहुत सुन्दर वैचारिक अभियक्ति... 

ऐतिहासिक बिम्बों के साथ सभ्यताओं की लुप्तता व सांस्कृतिक वैचारिक विकृतियों की डोर थामे आगे बढ़ती यह रचना.. सकारात्मक उद्बोधन बन चेताती भी है 

एकलव्य के कटे अंगूठे में अभी भी है प्राण,

अभी भी है छटपटाहट

पुनर्जीवित होने की और

खीचने की प्रत्यंचा.............................बहुत सुन्दर, सुदृढ़ वैचारिक अभिव्यक्ति 

इसके वृहत कैनवास के लिए तहे दिल से बधाई आदरणीय नीरज कुमार 'नीर'जी 

Comment by Neeraj Neer on January 18, 2014 at 9:43am

आ. सौरभ जी ह्रदय से आभार आपका, आपने सही कहा , कोई भी विचार हो वह सार्वभौमिक नहीं हो सकता ... इसलिए विचार परक कविता भी इससे अछूती नहीं रहती . आपके प्रोत्साहन के लिए ह्रदय तल से धन्यवाद .. 

Comment by Neeraj Neer on January 18, 2014 at 9:40am

गिरिराज भंडारी साहब आपका हार्दिक आभार. 

Comment by Neeraj Neer on January 18, 2014 at 9:39am

आदरणीया कुंती मुख़र्जी जी आपका हार्दिक धन्यवाद ..

Comment by Neeraj Neer on January 18, 2014 at 9:39am

आ . शिज्जू जी आपका धन्यवाद..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 16, 2014 at 11:55pm

विचारपरक कविता की प्रस्तुति के लिए हार्दिक धन्यवाद, नीरजजी.
वैचारिक कविताओं के साथ सर्वसमाहिता को लेकर सदा से संशय रहा है. यह भी कि रचनाकार या फिर पाठक पर एकांगी होने का दोष लग जाता है. कारण कि उथल-पुथल का दौर अनदेखा या अनसुना ही नहीं रहा है, बिना संदेह विकृत भी हुआ है. आखिर मोहनजोदड़ों का ’सच’ वही क्यों हो जो आरोपित है ? इसी कारण रिसाव में एकलव्य का अँगूठा असंवेदन के हत्थे शिकार दिखा. भावनाएँ अपनायी हुई हों तो अभिव्यक्ति का मूलतथ्य विन्दुवत नहीं रह जाता है. यही समस्या फिर सिर चढ़ जाती है और भूमि के पुत्र-पुत्रियों की दशा पर यही कारण है सभी ठग लोमड़-रोना करते दिखते हैं. फिर जो सोने की खानों में या कुबेरी अथवा आसुरी परंपरा को जैसी आग लगनी थी लग नहीं पाती है.

वैसे, तथ्यात्मकता को परे रखें तो आपकी इस कविता के कथ्य ने गहरे प्रभावित किया है.  यह आश्वस्ति सबल हुई है कि आप बड़े कैनवास की रचनाओं हेतु तैयार हैं.

शुभेच्छाएँ

हाँ, खान स्त्रीलिंग हैं. 



सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 16, 2014 at 10:26pm

आदरणीय नीरज भाई ,

एक दिन एकलव्य का अंगूठा

जुड़ जाएगा और

वह वाण पर रखकर तीर

उसी अंगूठे से खीचेगा प्रत्यंचा

और भेदेगा

द्रोणाचार्य के आत्माभिमान को

लग जाएगी आग सोने के खानों में. ----------- बहुत खूबसूरत बात कही भाई जी , इसी परिवर्तन का इंतिज़ार है !! आपको बहुत बधाई ॥

Comment by coontee mukerji on January 16, 2014 at 9:21pm

बहुत बहुत सुंदर रचना नीरज कुमार जी .हार्दिक बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 16, 2014 at 8:38pm

बहुत अच्छी रचना है आदरणीय नीरज बधाई आपको

Comment by Neeraj Neer on January 16, 2014 at 7:54pm

आपका आभार आ. अन्नपूर्णा जी .

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

माँ

माँ यह शब्द नहींं केवलइस जग की माँ से काया है। हम सबकी खातिर अतिपावन माँ के आँचल की छाया है।१।माँ…See More
yesterday
Dayaram Methani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अगर आप यों घबरा कर मैदान छोड़ देंगे तो जिन्होने एक जुट होकर षड़यन्त्र किया है वे अपनी जीत मानेंगे।…"
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अब, जबकि यह लगभग स्पष्ट हो ही चुका है कि OBO की आगे चलने की संभावना नगण्य है और प्रबंधन इसे ऑफलाइन…"
Monday
amita tiwari posted a blog post

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें बेगुनाही और इन्साफ की बात क्यों सोचती हैं ये औरतें चुपचाप अहिल्या बन…See More
Friday
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post गर्भनाल कब कट पाती है किसी की
" मान्य,सौरभ पांडे जीआशीष यादव जी , , ह्रदय से आभारी हूँ. स्नेह बनाए रखियगा | सौरभ जी ने एक…"
May 14

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on amita tiwari's blog post बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें
"आदरणीया अमिताजी, तार्किकता को शाब्दिक कर तटस्थ सवालों की तर्ज में बाँधा जाना प्रस्तुति को रुचिकर…"
May 14

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, आपकी प्रस्तुति निखर कर सामने आयी है. सभी शेर के कथ्य सशक्त हैं और बरबस…"
May 14

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय नीलेश भाई, आपका स्वागत है.     करेला हो अथवा नीम, लाख कड़वे सही, लेकिन रुधिर…"
May 14
Nilesh Shevgaonkar replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय बाग़ी जी एवं कार्यकारिणी के सभी सदस्यगण !बहुत दुखद है कि स्थिथि बंद करने तक आ गयी है. आगे…"
May 13

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय अजय गुप्ता जी, आपकी भावनाओं और मंच के प्रति आपके जुड़ाव को शब्द-शब्द में महसूस किया जा सकता…"
May 13
amita tiwari and आशीष यादव are now friends
May 11
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"मान्यवर  सौरभ पांडे जी , सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार."
May 11

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service