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मात्रिक छंद

जो रस्मों को मन से माने, पावन होती प्रीत वही तो!

जीवन भर जो साथ निभाए, सच्चा होता मीत वही तो!

 

रूढ़ पुरानी परम्पराएँ, मानें हम, है नहीं ज़रूरी।

जो समाज को नई दिशा दे, प्रचलित होती रीत वही तो!

 

मंदिर-मंदिर चढ़े चढ़ावा, भरे हुओं की भरती झोली।

जो भूखों की भरे झोलियाँ, होता कर्म पुनीत वही तो!

 

ऐसा कोई हुआ न हाकिम, जो जग में हर बाज़ी जीता,

बाद हार के जो हासिल हो, सुखदाई है जीत वही तो!

 

भाव बिना है कविता फीकी, बिना सुरीले बोल, तराने।

जो तन-मन को करे तरंगित मधुरिम है संगीत वही तो!

 

यूँ तो मिलती नेक नसीहत, भूलें जो बीता दुखदाई,

संग जिये पर जिसके पल-पल, होता याद अतीत वही तो!

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by कल्पना रामानी on February 2, 2014 at 9:29pm

सादर धन्यवाद आदरणीय सौरभ जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 31, 2014 at 2:11pm

सीख सुझाव देती इस ग़ज़ल के लिए आपका आभार आदरणीया कल्पना जी.
सादर

Comment by कल्पना रामानी on January 28, 2014 at 8:04pm

आ॰ प्रियंका जी हार्दिक धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on January 28, 2014 at 8:03pm

आ॰ प्राची जी, गजल पसंद करने के लिए  बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on January 28, 2014 at 8:02pm

आदरणीय मदन मोहन जी सादर धन्यवाद

Comment by Priyanka singh on January 25, 2014 at 6:41pm

आ० कल्पना जी ...बहुत सुन्दर रचना ....बधाई आपको ....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 24, 2014 at 12:21pm

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल लिखी है आ० कल्पना जी 

हर शेर पर बहुत बहुत बधाई प्रेषित है..स्वीकार करें 

Comment by Madan Mohan saxena on January 23, 2014 at 2:04pm
बहुत सुंदर प्रस्तुति ,आपको बहुत बधाई इस सार्थक गज़ल हेतु।
Comment by कल्पना रामानी on January 23, 2014 at 9:55am

आदरणीया वंदना तिवारी जी रचना की सराहना हेतु हार्दिक धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on January 23, 2014 at 9:50am

आदरणीय गिरिराज जी, अरुण जी,  श्याम नरेन जी, शिज्जु जी,  बसंत नेमा जी, आदरणीया वंदना जी, सरिता जी,  आप सबका गजल की सराहना द्वारा प्रोत्साहित करने के लिए हार्दिक आभार

सादर   

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