अनकही बातें धड़कतीं
मुस्कुराती
पल रही हैं.
थाम यादों की उँगलियाँ
स्वप्न जो
गुपचुप सजाये
शब्द आँखों में उफनते
क्या हुआ जो
खुल न पाये
भाव लहरें
तलहटी में
व्यक्त हो अविरल बही हैं.
रच गए जब
स्वप्न पट पर
नेह गाथा चित चितेरे
रंग फागुन से चुरा कर
कल्पनाओं में बिखेरे...
श्वास में
घुल कर बहीं जो
वो हवाएँ निस्पृही हैं.
खनखनाती खिलखिलाहट
प्रीत की
अनमोल पूँजी
व्यक्त हो
बन चीख-चिल्ली
द्वार जब-तब तोड़ गूँजी
किन्तु इस दहलीज पर
कब ये मिलन-पल
आग्रही हैं ?
Comment
बहुत सुन्दर नवगीत ..सादर बधाई
आदरणीया प्राचीजी ,
नवगीत के बाद भी गेयता कहीं बाधित नहीं है । मन में उठते गिरते भावों पर सुंदर नवगीत की हार्दिक बधाई ॥
अनिर्वचनीय गीत लिखा है आपने
बहुत बहुत शुभकामनायें प्रेषित करते हैं आपको ।
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