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ग़ज़ल : नयन में प्यार का गौहर सम्हाल रक्खा है

बह्र : १२१२ ११२२ १२१२ २२

---------

सभी से आँख चुराकर सम्हाल रक्खा है

नयन में प्यार का गौहर सम्हाल रक्खा है

 

कहेगा आज भी पागल व बुतपरस्त मुझे

वो जिसके हाथ का पत्थर सम्हाल रक्खा है

 

तेरे चमन से न जाए बहार इस खातिर

हृदय में आज भी पतझर सम्हाल रक्खा है

 

चमन मेरा न बसा, घर किसी का बस जाए

ये सोच जिस्म का बंजर सम्हाल रक्खा है

 

तेरे नयन के समंदर में हैं भँवर, तूफाँ

किसी के प्यार ने लंगर सम्हाल रक्खा है

 

तुझे पसंद जो आया सनम वही मैंने

ग़ज़ल में आज भी तेवर सम्हाल रक्खा है

--------

(मौलिक एवं प्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 2, 2014 at 7:04pm

बहुत बहुत धन्यवाद  शिज्जु शकूर जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 2, 2014 at 7:04pm

बहुत बहुत शुक्रिया रमेश कुमार चौहान जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 2, 2014 at 7:04pm

बहुत बहुत धन्यवाद Kewal Prasad जी

Comment by बृजेश नीरज on March 2, 2014 at 7:01pm

बहुत खूब! क्या बात है! आपको बहुत-बहुत बधाई!

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 2, 2014 at 6:56pm

बहुत बहुत शुक्रिया गिरिराज भंडारी जी

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on February 16, 2014 at 11:43pm

चमन मेरा न बसा, घर किसी का बस जाए

ये सोच जिस्म का बंजर सम्हाल रक्खा है

कहेगा आज भी पागल व बुतपरस्त मुझे

वो जिसके हाथ का पत्थर सम्हाल रक्खा है

 क्या कहने बहुत खूब....

बहुत खूब धर्मेंद्र जी...सभी शेर उम्दा है...

सुन्दर रचना
भ्रमर ५
प्रतापगढ़  उ.प्रदेश

Comment by Meena Pathak on February 13, 2014 at 4:35pm

क्या बात है ..... बहुत खूब ... बधाई आप को 

Comment by Neeraj Neer on February 13, 2014 at 9:40am

कहेगा आज भी पागल व बुतपरस्त मुझे

वो जिसके हाथ का पत्थर सम्हाल रक्खा है

 क्या कहने बहुत खूब .. सभी शेर बहुत उम्दा है . बधाई ..

Comment by नादिर ख़ान on February 13, 2014 at 12:10am

बहुत खूब आदरणीय धर्मेंद्र जी ....

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 12, 2014 at 7:57am

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई बहुत खूब ग़ज़ल कही, हर शेर दिल तक असर कर गया हार्दिक बधाई .

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