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1222/1222/1222/1222

अरे नादान ये मय है जिगर को ये जला ही दे

मेरे इस दर्दे दिल के वास्ते कोई दवा ही दे

 

कभी जब खींच ले जाये समंदर साथ अपने तो

गुज़रती मौज कश्ती को किनारे पर लगा ही दे

 

तेरी आँखों में मेरे दर्द की तासीर है शायद       (तासीर= असर)

उदासी भी तेरी इस बात की पैहम गवाही दे      (पैहम= लगातार)

 

इरादों को किया मजबूत तेरे पत्थरों ने ही

तेरा हर वार मेरा हौसला आखिर बढ़ा ही दे

 

बचूँगा कब तलक तेरी निगाहों से कहीं छुपकर

चलाना है तुझे जो तीर शब्दों के चला ही दे

 

यही दिन-रात उलझन है सताये डर मेरा मुझको

छुपाता हूँ ज़माने से खता सबको बता ही दे

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by shashi purwar on February 20, 2014 at 9:14am

वाह वाह वाह

बहुत सुन्दर गजल हैआदरणीय शकूर जी हार्दिक बधाई

इरादों को किया मजबूत तेरे पत्थरों ने ही

तेरा हर वार मेरा हौसला आखिर बढ़ा ही दे

 

बचूँगा कब तलक तेरी निगाहों से कहीं छुपकर

चलाना है तुझे जो तीर शब्दों के चला ही दे

 वाह -

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 19, 2014 at 11:34pm

इरादों को किया मजबूत तेरे पत्थरों ने ही

तेरा हर वार मेरा हौसला आखिर बढ़ा ही दे...........वाह! क्या बात है

बहुत शानदार गजल आदरणीय शिज्जू जी, बधाई स्वीकारें

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 19, 2014 at 7:32pm

भाई सारथी जी एवम चन्द्रशेखर जी आप दोनो का बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by Saarthi Baidyanath on February 19, 2014 at 10:43am

इरादों को किया मजबूत तेरे पत्थरों ने ही

तेरा हर वार मेरा हौसला आखिर बढ़ा ही दे....वाह जी साहब 

बचूँगा कब तलक तेरी निगाहों से कहीं छुपकर

चलाना है तुझे जो तीर शब्दों के चला ही दे...क्या बात है ...वाह !

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on February 18, 2014 at 11:23pm
जय हो

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 18, 2014 at 8:36pm

आदरणीय गिरिराज सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 18, 2014 at 8:35pm

भाई रमेश जी आपका आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 18, 2014 at 4:49pm

आदरणीय शिज्जू भाई , खूब सूरत गज़ल के लिये दिली मुबारक बाद स्वीकार करें ॥ ढेरों दाद ॥

बचूँगा कब तलक तेरी निगाहों से कहीं छुपकर

चलाना है तुझे जो तीर शब्दों के चला ही दे

 

यही दिन-रात उलझन है सताये डर मेरा मुझको

छुपाता हूँ ज़माने से खता सबको बता ही दे       ----------- लाजवाब !! आपको ढेरों दाद ॥

Comment by रमेश कुमार चौहान on February 18, 2014 at 10:46am

आदरणीय शकूर भैयाजी, खूबसूरत गजल कही है  आपने बधाई बधाई

कृपया ध्यान दे...

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