For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

एक कतरा रोशनी है एक कतरा जाम है

2122        2122    2122      212 

एक कतरा रोशनी है एक कतरा जाम है 

दिल जलों का दिल जलाने आ गयी फिर शाम है 

धडकनों की सुन जरा तू पास आकर के कभी 

धडकनों की हर सदा पर इक तेरा ही नाम है 

उनके क़दमों के नहीं नामों निशा भी अब कहीं 

ख्वाब में पर क़दमों की आहट को सुनना आम है

 

जुगनुओं की रोशनी से हर चमन आबाद था 

रोशनी क्या आज तो जुगनू हुआ गुमनाम है 

उनसे बिछड़े जाने कितने ही जमाने हो गए 

पर न सूखी आँख आँखों से छलकता जाम है 

मौलिक व अप्रकाशित 

Views: 543

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 14, 2014 at 4:46pm

आपकी ग़ज़ल पर दाद है, भाईजी.

धडकनों की सुन जरा तू पास आकर के कभी .. ’कर के’ का प्रयोग न ही करें तो उचित. के वस्तुतः कर का ही संक्षिप्त रूप है.
धडकनों की हर सदा पर इक तेरा ही नाम है... सदा पर या सदा में ?

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 25, 2014 at 2:06pm

धडकनों की सुन जरा तू पास आकर के कभी 

धडकनों की हर सदा पर इक तेरा ही नाम है ............बहुत सुकोमल शेर 

हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति पर 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on February 24, 2014 at 9:14pm

धडकनों की सुन जरा तू पास आकर के कभी 

धडकनों की हर सदा पर इक तेरा ही नाम है

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति...बढ़िया गजल बधाई आपको....जैसा की गिरिराज भाई ने सुझाया है कुछ अलग अर्थ में बनेगी गजल ..मुझे तो ये आप की लिखी सुन्दर लगी
भ्रमर ५

Comment by Shyam Narain Verma on February 22, 2014 at 4:14pm
बहुत बढ़िया गजल बधाई आपको । 
Comment by ram shiromani pathak on February 22, 2014 at 3:41pm

अहा आनंद आ गया बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय आशुतोष  जी आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥//सादर

Comment by Neeraj Neer on February 22, 2014 at 9:01am

दिलजलों का दिल जलाने आ गयी फिर शाम है ....  वह बहुत खूब . सुन्दर ग़ज़ल कही है .

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on February 22, 2014 at 8:51am

धडकनों की सुन जरा तू पास आकर के कभी 

धडकनों की हर सदा पर इक तेरा ही नाम है ..............वाह! बहुत खूब

हार्दिक बधाई स्वीकारें इस सुंदर गजल पर आदरणीय डा.आशुतोष जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 21, 2014 at 7:28pm

आदरणीय आशुतोष भाई , बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है , आपको हार्दिक बधाइयाँ ॥

धडकनों की सुन जरा तू पास आकर के कभी  -- इस मिसरे मे  की , की जगह  को  कहना सही रहेगा , या ज़रा की जगह सदा कहना सही होगा , ऐसा मुझे लगता है , आपक पढ़ के देख लीजियेगा , शायद आपको भी सही लगे ॥

Comment by shashi purwar on February 21, 2014 at 2:53pm

वाह वाह आदरणीय आशुतोष जी बहुत सुन्दर गजल है

एक कतरा रोशनी है एक कतरा जाम है 

दिल जलों का दिल जलाने आ गयी फिर शाम है 

धडकनों की सुन जरा तू पास आकर के कभी 

धडकनों की हर सदा पर इक तेरा ही नाम है 

उनके क़दमों के नहीं नामों निशा भी अब कहीं 

ख्वाब में पर क़दमों की आहट को सुनना आम है

 वाह बहुत पसंद आये शेर , हार्दिक बधाई

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"दिल दुखाना नहीं कि तुझ से कहेंहै फसाना नहीं कि तुझ से कहें गांव से दूर घर बनाया हैहै बुलाना नहीं…"
14 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-184
"धन्यवाद आदरणीय "
18 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"प्रणाम भाई अखिलेश जी, क्या ही सुंदर चौपाईयां हुईं हैं। वाह, वाह। फागुन का पूरा वृतांत कह दिया…"
18 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"बौर से फल तक *************** फागुन आया ऐसा छाया, बाग़ आम का है बौराया भरी मंजरी ने तरुणाई, महक रही…"
22 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
" दिल रुलाना नहीं कि तुझ से कहें  हम ज़माना नहीं कि  तुझ से…"
22 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
" दिल रुलाना नहीं कि तुझसे कहें  हम ज़माना नहीं कि तुझसे कहें   फ़क़त अहसास है…"
23 hours ago
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-184
"भाई अजय गुप्ता जी, मेरी नजर में बहुत शनदार रचना हुई है। इसके लिए बहुत बहुत बधाई। अनुष्टुप छंद तो…"
23 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-184
"यह रचना #अनुष्टुप_छंद में रचने का प्रयास किया है। हिन्दी में इस छंद का प्रयोग कम है लेकिन मेरा…"
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-184
"झूठों ने झूठ को ऊँचे, रथ पर बिठा दिया और फिर उसे खूब, सुंदर सा सजा दिया   पहिये भी गवाहों के,…"
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"कृपया गिरह में // वो ज़माना // को //अब ज़माना// पढ़ा जाए। धन्यवाद "
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"शुक्रिया मनजीत जी, बहुत आभार। ।  //तरही मिसरे पर आपका शेअर कमाल है।// हा हा हा, तिलकराज…"
yesterday
Manjeet kaur replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
" आदरणीय अजय गुप्ता जी ग़ज़ल की मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए। तरही मिसरे पर आपका शेअर कमाल है।"
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service