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तुम ही तुम..........बृजेश

निःश्वसन

उच्छ्वसन

सब देह-कर्म, यह अवगुंठन

मोह-पाश के बंधन तुम

बस तुम! तुम ही तुम

 

व्यक्त हाव

अव्यक्त भाव

नेह-क्लेश, अभाव-विभाव

रूप-गंध के कारण तुम

बस तुम! तुम ही तुम

 

सम्मुख हो जब

विमुख हुए, तब 

मनस-पटल की चेतनता सब 

अनुभूति-रेख में केवल तुम

बस तुम! तुम ही तुम

- बृजेश नीरज 

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 985

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Comment by बृजेश नीरज on April 14, 2014 at 7:56pm

आदरणीय सुरेन्द्र जी आपका बहुत-बहुत आभार!

Comment by बृजेश नीरज on April 14, 2014 at 7:55pm

आदरणीया प्राची जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 14, 2014 at 7:21pm

सम्मुख हो जब

विमुख हुए, तब 

मनस-पटल की चेतनता सब 

अनुभूति-रेख में केवल तुम

बस तुम! तुम ही तुम

नीरज भाई बहुत सुन्दर शब्द बंधन गूढ़ सुन्दर रचना
भ्रमर ५


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 3, 2014 at 9:19am

देह भाव अनुभूतियाँ दृश्य अदृश्य सबमें व्याप्त उस 'तुम' को पहचानते हुए उस तुम के साथ एक हो जाने पर ही ऐसी अभिव्यक्ति संभव है...

बहुत  गहन रचना 

आ० बृजेश जी आपको सादर बधाई इस अभिव्यक्ति पर.

Comment by बृजेश नीरज on March 28, 2014 at 6:53pm

आदरणीय सौरभ जी, आपका हार्दिक आभार! जो कुछ भी, जितना कुछ भी मेरी कलम चल पा रही है, इस मंच की ही देन है.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 28, 2014 at 3:01am

इस मंच पर आपकी इस रचना ने अपना स्थान बनाया है. यह रचना सामान्य सी घटना या रुटीनी प्रस्तुति नहीं है.
शरीर मन और चेतना. इन तीन विन्दुओं को इतनी सुगढ़ता से आपने बाँधा है कि बरबस दिल वाह कर उठता है.

इस मंच पर अभीतक प्रस्तुत हुई वैचारिक रचनाओं के सामने चुनौती की लकीर खींचती हुई है प्रस्तुत होती है यह रचना.
यह तो हुई विधाजन्य बातें.

भाई बृजेशजी, एक कवि के तौर पर आप एक बड़ी छलाँग लगाते हुए आगे आये दिखे हैं. कविता की इस विधा की मांग को समझना एक बात है, उस मांग को पूरा करने के क्रम में बिना पूर्वर्तियों का अंधानुकरण करते हुए अपनी बात करना ही मुख्य बात है. आप इसी विन्दु पर सफल हुए हैं.
हार्दिक बधाई और हृदय से शुभकामनाएँ.

Comment by बृजेश नीरज on March 26, 2014 at 7:46pm

आदरणीय शरदिंदु जी आपका हार्दिक आभार! आपके शब्द मुझे बहुत प्रोत्साहित करते हैं!

सादर!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on March 26, 2014 at 2:20am
बृजेश जी, आपकी यह रचना आपके लगातार प्रयोग करने की सुघढ़ प्रवृत्ति और उन्नत चिंतन का जाज्ज्वल्यमान उदाहरण है. एक पाठक के तौर पर आत्मा को प्रगाढ़ शांति की अनुभूति हुई. आपको हृदय से साधुवाद. सादर.
Comment by बृजेश नीरज on March 25, 2014 at 9:22pm

आदरणीय आशुतोष जी आपका हार्दिक आभार! आपको रचना रोचक लगी, मेरा प्रयास सार्थक हुआ!

Comment by बृजेश नीरज on March 25, 2014 at 9:22pm

आदरणीय निकोर साहब आपका बहुत-बहुत आभार!

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