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1222- 1222- 1222

मुसीबत साथ आई हमसफर की तरह

लगे है धूप भी अब राहबर की तरह

 

सहे जाता हूँ मौसम की अज़ीयत मैं                     अज़ीयत =यातना

बियाबाँ मे किसी उजड़े शजर की तरह

 

झुलसने लगता है मन सुब्ह उठते ही

हुये दिन गर्मियों की दोपहर की तरह

 

घुटन होने लगी है इन हवाओं मे

जहाँ लगने लगा है बन्द घर की तरह

 

हिसारे ग़म से बाहर लाये कोई तो                    हिसारे ग़म= ग़म का घेरा

मुसल्सल घूमता हूँ इक भँवर की तरह

 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on April 1, 2014 at 8:37am

आदरणीया शिज़्जू जी
शुक्रिया..
मतलब..आपने..तरह की तख़्ती 21 रक्खी है..ये तो ठीक है पर सिर्फ़ इस अरकान के सालिम रूप मेन जितनी भी बे'हर है..लघु की छूट नहीं ली जा सकती..मैं ग़लत भी हो सकता हूँ..ज्ञानी जान कृपया इसे बताएँ.
मेरी बात को चर्चा के रूप में ही लें..आख़िर हम सब सीख रहे है


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Comment by शिज्जु "शकूर" on April 1, 2014 at 7:55am

आदरणीया वंदना जी आपका तहेदिल से शुक्रिया


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Comment by शिज्जु "शकूर" on April 1, 2014 at 7:55am

आदरणीय मुकेश भाई आपका हार्दिक आभार। अरूज में छूट के अनुसार किसी भी अरकान में एक अतिरिक्त लघु लिया जा सकता है बशर्ते वह एक स्वतंत्र लघु न हो।


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Comment by शिज्जु "शकूर" on April 1, 2014 at 7:53am

आदरणीया कुंती जी आप जैसी समर्पित रचनाकार से सराहना पाना बड़े गौरव की बात है आपका हार्दिक आभार


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Comment by शिज्जु "शकूर" on April 1, 2014 at 7:52am

आदरणीय गुमनाम भाई आपका हार्दिक आभार

Comment by vandana on April 1, 2014 at 6:47am

सहे जाता हूँ मौसम की अज़ीयत मैं                     

बियाबाँ मे किसी उजड़े शजर की तरह

हिसारे ग़म से बाहर लाये कोई तो                    

मुसल्सल घूमता हूँ इक भँवर की तरह

वाह एक शानदार ग़ज़ल आदरणीय 

Comment by Mukesh Verma "Chiragh" on March 31, 2014 at 11:33pm

आदरणीय शिज़्जू जी
अच्छी ग़ज़ल कही है आपने ..ख़याल भी खूबसूरत है..

पर क्या इस इस बे'हर मे किसी तरह की छूट ली जा सकती है?

मफाईलून.. 
मुबारकबाद और दाद

Comment by coontee mukerji on March 31, 2014 at 4:50pm

बहुत सुंदर गज़ल.....

मुसीबत साथ आई हमसफर की तरह

लगे है धूप भी अब राहबर की तरह.....बहुत बहुत बधाई शकूर भाई.

Comment by gumnaam pithoragarhi on March 31, 2014 at 4:06pm

शकूर जी ! बधाई ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,खूब कहा है

मुसीबत साथ आई हमसफर की तरह

लगे है धूप भी अब राहबर की तरह

 

सहे जाता हूँ मौसम की अज़ीयत मैं                    

बियाबाँ मे किसी उजड़े शजर की तरह

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

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