For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल -इक वहीँ से मुकद्दर दिला दीजिए

एक पुरानी ग़ज़ल -

२१२२    १२२१   २२१२

बेकली मेरे दिल की मिटा दीजिए

ऐ मेरे चारागर कुछ दवा दीजिए

 

कुछ तो जज्बात मेरे समझिए जरा

कुछ तो मेरी वफ़ा का सिला दीजिए

 

दिल धुआं है मगर शोले जलते नहीं

इन शरारों को थोड़ी हवा दीजिए

 

बस तिज़ारत जहाँ पर नसीबों की हो

इक वहीँ से मुकद्दर दिला दीजिए

 

नींद आई थी जब एक अरसा  हुआ

उम्र भर के लिए अब सुला दीजिए

 

दम घुटा है बहुत सोने की कैद में

मेरी माटी से मुझको मिला दीजिए

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 1070

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by SALIM RAZA REWA on April 6, 2014 at 9:36pm

नींद आई थी जब इक जमाना हुआ

उम्र भर के लिए अब सुला दीजिए...............

 

दम घुटा है बहुत सोने की कैद में

मेरी माटी से मुझको मिला दीजिए..............बहुत खूब! 

Comment by coontee mukerji on April 6, 2014 at 12:54pm

बहुत सुंदर गज़ल. हार्दिक बधाई.

Comment by Shyam Narain Verma on April 5, 2014 at 4:33pm
अच्छी ग़ज़ल की हार्दिक बधाई ।
Comment by vijay nikore on April 5, 2014 at 11:06am

 

सुन्दर भावों से सजी इस गज़ल के लिए आपको बहुत बधाई।

Comment by sanju shabdita on April 4, 2014 at 8:25pm

हार्दिक धन्यवाद आदरणीय नीरज नीर जी

Comment by sanju shabdita on April 4, 2014 at 8:24pm

हार्दिक आभार आदरणीया प्राची दी प्रस्तुत ग़ज़ल को मान देने हेतु ..आपका समर्थन अत्यंत महत्वपूर्ण है .मार्गदर्शन बनाये रखिए.सादर

Comment by sanju shabdita on April 4, 2014 at 8:21pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Baidyanath Saarthi जी

Comment by Neeraj Neer on April 4, 2014 at 8:07pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है ..बहुत बधाई ..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on April 4, 2014 at 7:48pm

नींद आई थी जब इक जमाना हुआ

उम्र भर के लिए अब सुला दीजिए...............बहुत मार्मिक भाव 

 

दम घुटा है बहुत सोने की कैद में

मेरी माटी से मुझको मिला दीजिए..............बहुत खूब! 

बहुत सुन्दर गहन भावों को शब्द मिले हैं अश'आरों में 

बहुत बहुत बधाई प्रिय संजू शब्दिता जी 

Comment by Saarthi Baidyanath on April 3, 2014 at 4:49pm

बहुत बढ़िया ग़ज़ल..

दम घुटा है बहुत सोने की कैद में

मेरी माटी से मुझको मिला दीजिए...दाद स्वीकार करें !

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजलपर उपस्थिति और सप्रेमं मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। इसे बेहतर…"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post न पावन हुए जब मनों के लिए -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति व उत्ताहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। क्रोध पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई। साथ ही भाई अशोक जी की बात…"
2 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देवता चिल्लाने लगे हैं (कविता)
"   आदरणीय धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी सादर, धर्म के नाम पर अपना उल्लू सीधा करती राजनीति में…"
8 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post न पावन हुए जब मनों के लिए -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"   हमारे बिना यह सियासत कहाँजवाबों में हम हैं सवालों में हम।३।... विडम्बना…"
8 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"   सूर्य के दस्तक लगानादेखना सोया हुआ है व्यक्त होने की जगह क्यों शब्द लुंठितजिस समय…"
8 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on vijay nikore's blog post सुखद एकान्त है या है अकेलापन
"      तरू तरु के पात-पात पर उमढ़-उमढ़ रहा उल्लास मेरा मन क्यूँ उन्मन क्यूँ इतना…"
9 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, क्रोध विषय चुनकर आपके सुन्दर दोहावली रची है. हार्दिक बधाई स्वीकारें.…"
9 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"  आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, प्रस्तुत ग़ज़ल पर उत्साहवर्धन के लिए आपका दिल से शुक्रिया.…"
9 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"   आदरणीय भाई लक्षमण धामी जी सादर, प्रस्तुत ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
9 hours ago
Sushil Sarna commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"वाह बहुत सुंदर प्रस्तुति हुई है आदरणीय लक्ष्मण धामी जी । हार्दिक बधाई "
10 hours ago
Sushil Sarna commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"वाहहहहहह आदरणीय क्या ग़ज़ल हुई है हर शे'र पर वाह निकलती है । दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं…"
10 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service