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धरती की गुहार अम्बर से !!

प्यासी धरती आस लगाये देख रही अम्बर को |
दहक रही हूँ सूर्य ताप से शीतल कर दो मुझको ||

पात-पात सब सूख गये हैं, सूख गया है सब जलकल  
मेरी गोदी जो खेल रहे थे नदियाँ जलाशय, पेड़ पल्लव
पशु पक्षी सब भूखे प्यासे हो गये हैं जर्जर
भटक रहे दर-दर वो, दूँ मै दोष बताओ किसको
प्यासी धरती आस लगाए देख रही अम्बर को |

इक की गलती भुगत रहे हैं, बाकी सब बे-कल बे-हाल
इक-इक कर सब वृक्ष काट कर बना लिया महल अपना
छेद-छेद कर मेरा सीना बहा रहे हैं निर्मल जल
आहत हो कर इस पीड़ा से देख रही हूँ तुम को

प्यासी धरती आस लगाए देख रही अम्बर को |

सुन कर मेरी विनती अब तो, नेह अपना छलकाओ तुम
गोद में मेरी बिलख रहे जो उनकी प्यास बुझाओ तुम
संतति कई होते इक माँ के पर माँ तो इक होती है
एक करे गलती तो क्या देती है सजा सबको ?
प्यासी धरती आस लगाए देख रही अम्बर को |

जो निरीह,आश्रित हैं जो, रहते हैं मुझ पर निर्भर
मेरा आँचल हरा भरा हो तब ही भरता उनका उदर
तुम तो हो प्रियतम मेरे, तकती रहती हूँ हर पल
अब जिद्द छोड़ो इक की खातिर दण्ड न दो सबको  
प्यासी धरती आस लगाए देख रही अम्बर को |

झड़ी लगा कर वर्षा की सिंचित कर दो मेरा दामन
प्रेम की बूंदों से छू कर हर्षित कर दो मेरा तनमन
चहके पंक्षी, मचले नदियाँ, ओढूं फिर से धानी चुनर 
बीत गए हैं बरस कई किये हुए आलिंगन तुमको
प्यासी धरती आस लगाए देख रही अम्बर को ||

मीना पाठक 
मौलिक/अप्रकाशित 

Views: 745

Comment

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Comment by Meena Pathak on May 21, 2014 at 11:40am

आदरणीया कुन्ती दी आपका हार्दिक आभार ..मेरी सभी रचनाएँ आप के आशीर्वाद से सिंचित होती हैं और मुझे और लिखने को प्रेरित करती हैं ...बहुत बहुत आभार ,,नमन 

सादर 

Comment by Meena Pathak on May 21, 2014 at 11:36am

आदरणीय गोपाल नारायण जी रचना सराहने हेतु बहुत बहुत आभार | सादर 

Comment by Meena Pathak on May 21, 2014 at 11:35am

प्रिय कल्पना जी बहुत बहुत आभार | सस्नेह 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on May 21, 2014 at 10:28am

आदरणीया मीना पाठक जी, सुन्दर रचना के लिए बधाइयाँ ....................


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 20, 2014 at 9:28pm

आनेवाले समय धरा की कुछ ऐसी ही गति होने वाली है बहुत अच्छी रचना है आदरणीया मीना जी बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by coontee mukerji on May 20, 2014 at 8:17pm


झड़ी लगा कर वर्षा की सिंचित कर दो मेरा दामन
प्रेम की बूंदों से छू कर हर्षित कर दो मेरा तनमन
चहके पंक्षी, मचले नदियाँ, ओढूं फिर से धानी चुनर 
बीत गए हैं बरस कई किये हुए आलिंगन तुमको
प्यासी धरती आस लगाए देख रही अम्बर को ||.....मन की कितनी सुंदर आशाएँ छिपी हुई है इन पक्तियाँ में. मीना जी आपाकी रचनाओं में सदैव नारी मन की पीड़ा झलकती है.....साधुवाद देती हूँ. ..सादर.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 20, 2014 at 5:48pm

भावो  से ओत प्रोत इस रचना के लिए  हार्दिक धन्यवाद i

Comment by kalpna mishra bajpai on May 20, 2014 at 11:16am

सुंदर रचना मीना दी, बहुत बधाई

Comment by Meena Pathak on May 19, 2014 at 8:13pm

आभार श्याम नारायण जी | सादर 

Comment by Shyam Narain Verma on May 19, 2014 at 10:04am
सुंदर रचना के लिए बहुत बधाई सादर..................

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