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तोड़ धैर्य के बाँध को, उफन गया सैलाब।

कुछ से उम्मीदें बढ़ीं, कुछ के टूटे ख़्वाब।।

 

लाँघी सीमा क्रोध की, ऐसा क्या आक्रोश।

भला बुरा सोचा नहीं, अंधा सारा जोश।।

 

श्रम भी काम न आ सका, काम न आया अर्थ।

बुरे कर्म की कालिमा, यत्न हुआ सब व्यर्थ।।

 

राग द्वेष का हो मुखर, जिनके मुख से राग।

शक्ति उन्हें मिल ही गई, जो-जो उगलें आग।।

 

ज्यों बिल्ली के भाग से, छींका फूटा आज।

दण्ड एक को यों मिला, दूजा पाये राज।।

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on June 3, 2014 at 10:57am

आदरणीय सौरभ सर आपका हार्दिक आभार


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 1, 2014 at 1:22am

हर दोहे के लिए अलग-अलग बधाई, शिज्जू भाईजी. 

बहुत खूब !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 29, 2014 at 10:09am

आदरणीय बृजेश जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 29, 2014 at 10:09am

आदरणीय जवाहरलाल जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 29, 2014 at 10:09am

आदरणीय सुरेन्द्र जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 29, 2014 at 10:08am

आदरणीय गिरिराज सर आपका आभार

Comment by बृजेश नीरज on May 27, 2014 at 7:27pm

बहुत सुन्दर दोहे! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 26, 2014 at 9:46pm

अजब गजब दोहे कहे, करें नहीं अब राग
विद्वानों ने भी गाये, मिला राग में राग!

 सादर श्री शिज्जू शकूर जी 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 26, 2014 at 2:56pm

श्रम भी काम न आ सका, काम न आया अर्थ।

बुरे कर्म की कालिमा, यत्न हुआ सब व्यर्थ।।

सुन्दर भाव ...अच्छी रचना ....सुन्दर सन्देश देते हुए
भ्रमर ५


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 26, 2014 at 12:43pm

आदरणीय शिज्जू भाई , सुन्दर दोहो की रचना की है , इशारा साफ है , सार्थक दोहों के लिये आपको बधाई ॥

हार जीत के खेल मे , इक की होती जीत

अब चाहे नफरत करो , चाहे उससे प्रीत

कृपया ध्यान दे...

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