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नीले नीले नयनो पर पलकों का पहरा

2122  2122   2122

नीले नीले नयनो पर पलकों का पहरा

जैसे  चिलमन झील पे कोई  हो पसरा

 

दिल तेरा बेचैन है मुझको भी मालुम

बाँध लूं कैसे मैं लेकिन सर पे सहरा

 

झीने बस्त्रों में तेरा मादक सा ये तन  

जैसे बैठा चाँद कोई ओढ़े कुहरा  

 

सुध में उसकी होश मेरे जब भी उड़ते

जग को लगता जैसे मैं कोई हूँ बहरा

 

उसकी बातें ज्यों हो कोयल कूके कोई

उतरे बन अहसास कोई दिल पे गहरा 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 4, 2014 at 1:40pm

आदरणीय निलेश जी ..उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 4, 2014 at 1:26pm

आदरणीय सौरभ सर ..सादर प्रणाम ...आपकी हर प्रतिक्रिया नित्य ही कुछ न कुछ सिखाती है ..आपका स्नेह बस यूं ही मिलता रहे ..इसी कामना के साथ 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 3, 2014 at 12:11pm

अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 3, 2014 at 12:02pm

मालुम  को मालूम भी किया जाय तो अरुज़ के लिहाज से दोष नहीं होगा.

कई विद्वान कहते हैं कि मिसरों में दीर्घ मात्राओं को बार-बार गिराने से बचना चाहिये. यह एक सुविधा ही है न कि जरुरत.

ग़ज़ल से मासूमीयत छलकी दिखती है. इसके लिए दिल से दाद कुबूल करें.

शुभ-शुभ

Comment by बृजेश नीरज on May 28, 2014 at 9:50pm

सुन्दर ग़ज़ल! आपको बहुत बधाई!

मालुम ?........ यह टंकण की त्रुटि है या इसी तरह प्रयोग किया गया है?

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 28, 2014 at 7:28pm

नीले नीले नयनो पर पलकों का पहरा

जैसे  चिलमन झील पे कोई  हो पसरा - वाह ! उम्दा गजल रचना हुई है | बधाई श्री आशुतोष मिश्रा जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 28, 2014 at 5:33pm

आदरनीय आशुतोष भाई , अच्छी ग़ज़ल कही है , आपको बधाइयाँ ॥

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on May 28, 2014 at 2:54pm

  pyaaree gazal mitra

Comment by Meena Pathak on May 27, 2014 at 4:10pm

बेहतरीन ......बहुत बहुत बधाई | सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 27, 2014 at 11:33am

बहुत खुबसूरत गजल आदरणीय डा.आशुतोष जी, दिली बधाई स्वीकार करें

कृपया ध्यान दे...

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