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बेमजा यार सफर रोज नई राहों का

2122     112 2     1122    22

**
खार  हूँ  एक  ये  सोचा   है  सभी  ने मुझको
फूल के साथ  जो  देखा  है  सभी  ने  मुझको

**

बंद सदियों  से  पड़ा  था  मैं  किसी  कोने में
खत तेरा जान के  खोला  है सभी ने मुझको

**
भोर सा रास  तुझे  आज   मगर  आया क्यूँ
तम भरी  रात जो बोला  है  सभी ने मुझको

**
दाद  वैसे  तो   मिली  बात  बुरी भी  कह दी
बस तेरी  बात  पे  कोसा  है सभी ने मुझको

**
रूह  की  बात  किसे   यार  लगी  सौदों  की
सिर्फ तन से ही तो तोला है सभी ने मुझको

**
बंद  आहट  से  मेरी  रोज  हुआ  जो  यारब
फिर उसी  द्वार पे भेजा  है सभी ने मुझको

**
हाल  मेरा   जो  हुआ   है  ये  फकीरों  जैसा
हर गली गाँव  में   रोका  है सभी ने मुझको

**
बेमजा   यार   सफर   रोज   नई  राहों का
हर नये  मोड़  पे  टोका है  सभी ने मुझको

**                 **              **          **
(रचना - 10 मार्च 2009)
मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

Views: 915

Comment

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Comment by गिरिराज भंडारी on May 28, 2014 at 5:30pm

आदरणीय ल्क्ष्मन भाई , ग़ज़ल अच्छी कही है , आपको बधाइयाँ ॥ मै भी आदरणीय शकील भाई से सहमत हूँ , बह्र के रुक्न आपने ग़लत लिया है ।

Comment by Shyam Narain Verma on May 28, 2014 at 4:03pm
बहुत सुन्दर गजल।  ढेरों दाद कुबूल करें। सादर
Comment by शकील समर on May 28, 2014 at 3:56pm

उम्दा गजल आदरणीय। बधाई स्वीकारें।

एक बात
आपने जो अर्कान लिया है उसे लेकर असमंजस में हूं। मेरे ख्याल से रुक्न इस तरह से टूटेगा।

2122/1122/1122/22

अगर आप अपने अर्कान को लेकर आश्वस्त हैं तो कृप्या बह्र के बारे में बताने का कष्ट करें। सादर।

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on May 28, 2014 at 2:49pm

 badhiyaa mitra - badhaaee

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 28, 2014 at 2:04pm

बहुत अच्छी i

बंद आहट से ---

शुभान  अल्लाह i

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