2122 112 2 1122 22
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खार हूँ एक ये सोचा है सभी ने मुझको
फूल के साथ जो देखा है सभी ने मुझको
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बंद सदियों से पड़ा था मैं किसी कोने में
खत तेरा जान के खोला है सभी ने मुझको
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भोर सा रास तुझे आज मगर आया क्यूँ
तम भरी रात जो बोला है सभी ने मुझको
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दाद वैसे तो मिली बात बुरी भी कह दी
बस तेरी बात पे कोसा है सभी ने मुझको
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रूह की बात किसे यार लगी सौदों की
सिर्फ तन से ही तो तोला है सभी ने मुझको
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बंद आहट से मेरी रोज हुआ जो यारब
फिर उसी द्वार पे भेजा है सभी ने मुझको
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हाल मेरा जो हुआ है ये फकीरों जैसा
हर गली गाँव में रोका है सभी ने मुझको
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बेमजा यार सफर रोज नई राहों का
हर नये मोड़ पे टोका है सभी ने मुझको
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(रचना - 10 मार्च 2009)
मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’
Comment
आदरणीय ल्क्ष्मन भाई , ग़ज़ल अच्छी कही है , आपको बधाइयाँ ॥ मै भी आदरणीय शकील भाई से सहमत हूँ , बह्र के रुक्न आपने ग़लत लिया है ।
बहुत सुन्दर गजल। ढेरों दाद कुबूल करें। सादर |
उम्दा गजल आदरणीय। बधाई स्वीकारें।
एक बात
आपने जो अर्कान लिया है उसे लेकर असमंजस में हूं। मेरे ख्याल से रुक्न इस तरह से टूटेगा।
2122/1122/1122/22
अगर आप अपने अर्कान को लेकर आश्वस्त हैं तो कृप्या बह्र के बारे में बताने का कष्ट करें। सादर।
badhiyaa mitra - badhaaee
बहुत अच्छी i
बंद आहट से ---
शुभान अल्लाह i
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