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मैं मूक बन जाती हूँ …।

मैं मूक बन जाती हूँ …।

नहीं, अब मैं इस गहन तम में नभ को न निहारूंगी
अपनी अभिलाषाओं को तम के गहन गर्भ में दबा दूंगी
दर्द की नमी को पलकों में ही दफना दूंगी
अपने गिले -शिकवों का बवंडर अपने दिल के किसी कोने में छुपा लूंगी

कितना विशवास था
तुम तो मेरे हृदय की टीस को पहचानोगे
यौवन की दहलीज़ पर पाँव रखते ही
हर निशा मैं तुम्हें निहारती थी
शशांक मेरे पागलपन पर मुस्कुराता था
पवन मुझे समझाती थी
मगर मैं स्वयं में खोई थी
सलौने सपनों में सोई थी
न जाने किसके लिए दिल धड़कता था
मेरा ख्वाब सवेरा होने से डरता था
हर बार सोचती थी मेरी मुराद पूरी होगी
लोग कहते हैं तो सही कहते होंगे
यही सोच सोच मैं
सुबह से शाम तक रात की प्रतीक्षा करती थी

रात आते ही बहुत प्रसन्न होती थी
गहन अन्धकार में नभ को एकटक निहारती थी
तारे के टूटते ही
हाथ जोड़ कर
अपने हृदय के आँगन में बसी छवि की गुहार करती
तारे टूटते रहे
हर तारे के साथ मेरे ख्वाब भी टूटते रहे

बेमन से मैं आज भी रात निहारती हूँ
मगर किसी तारे के टूटने पर
कुछ भी नहीं मांगती
अतृप्ति के गंभीर परिणाम से घबराती हूँ
इसीलिए मैं मूक बन जाती हूँ


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 682

Comment

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Comment by Sushil Sarna on June 10, 2014 at 2:47pm

आदरणीय सौरभ पाण्डेय  जी रचना पर आपकी  मधुर प्रशंसात्मक अभिव्यक्ति  का हार्दिक आभार 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 9, 2014 at 2:19pm

आपकी इस संवेदनशील अभिव्यक्ति के लिए हृदय से धन्यवाद आदरणीय.

शुभ-शुभ

Comment by Sushil Sarna on June 4, 2014 at 6:01pm

 आदरणीया गिरिराज भंडारी जी   रचना पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार

Comment by Sushil Sarna on June 4, 2014 at 6:00pm

 आदरणीया विंदू जी  रचना पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार

Comment by Sushil Sarna on June 4, 2014 at 5:59pm

 आदरणीया कल्पना रमानी  जी  रचना पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार

Comment by Sushil Sarna on June 4, 2014 at 5:56pm

 आदरणीया मीना पाठक जी  रचना पर आपकी स्नेहिल प्रशंसा का हार्दिक आभार

Comment by Sushil Sarna on June 4, 2014 at 5:55pm

 आदरणीया कुंती मुख़र्जी रचना पर आपकी मधुर  प्रशंसा का हार्दिक आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 4, 2014 at 10:52am

आदरणीय , बहुत सुन्दर , लगातार के निराशा से उपजे भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति हुई है , आपको बधाइयाँ ॥

Comment by Vindu Babu on June 4, 2014 at 12:02am

गहन और मार्मिक रचना हुई है आदरणीय सुशील जी।

 नारी हृदय की वेदना को अभिव्यक्त करना आसान नही है लेकिन अपने बड़ी सहजता से अभिव्यक्त किया है।

हार्दिक बधाई आपको।

सादर

Comment by कल्पना रामानी on June 3, 2014 at 10:56pm

मगर किसी तारे के टूटने पर
कुछ भी नहीं मांगती
अतृप्ति के गंभीर परिणाम से घबराती हूँ
इसीलिए मैं मूक बन जाती हूँ......बहुत सुंदर पंक्तियाँ, आदरणीय, हार्दिक बधाई आपको

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