फिर किया है कत्ल उसने इश्तिहार है
शुक्र है वो हर गुनाह का जानकार है
कत्ल वो हथियार से करता नहीं कभी
कत्ल करने की अदा कजरे की धार है
अब वफादारी निभाता कौन है यहाँ
अब मुहब्बत हो गयी नौकाबिहार है
आजकल लगने लगा हैं वो कुछ नया नया
फिर हुआ शायद कोई उसका शिकार है
झूठ भारी हो गया सच के मुकाबले
आजकल सच हारता क्यों बार बार है
मार डालें ना मुझे बेचैनियाँ मेरी
दिल मेरा ये सोचकर अब सौगंवार है
सिर्फ अश्कों की नमी है मेरे शह्र में
अब यहाँ होती है वारिस कब कभार है
मूँद लूँ आँखें तेरा दीदार हो जरा
दिल मुद्दतों देखने को बेकरार है
तो चले अन्तिम सफर आगे उमेश का
मुस्करादेें वो जरा ये इन्तजार है
उमेश कटारा
मौलिक व अप्रकाशित
Comment
आदरणीय उमेश भाई , बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है , आपको बधाइयाँ ॥
आ. उमेश भाई जी सुन्दर ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई l
shukriya narenshinh chauhan sahb
shukriya Dr.Vijay shankar ji
Shukriya Abhinav Arun sir
SHUKRIYA डा गोपाल नारायन जी
कटारा जी
शिर्फ़ अश्को की नमी है मेरे शह्र में
अब होती यहाँ बारिश कभी-कभार है i बहुत उम्दा i बधाई i
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