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कांच की दीवार :नीरज कुमार नीर

तुम्हारे और मेरे बीच है
कांच की एक मोटी दीवार
जो कभी कभी अदृश्य प्रतीत होती है
और पैदा करती है विभ्रम
तुम्हारे मेरे पास होने का

मैं कह जाता हूँ अपनी बात
तुम्हें सुनाने की उम्मीद में
तुम्हारे शब्दों का खुद से ही
कुछ अर्थ लगा लेता हूँ.

क्या तुम समझ पाती होगी
मैं जो कहता हूँ
क्या मैं सही अर्थ लगाता हूँ
जो तुम कहती हो ..

कांच की इस दीवार पर
डाल दिए हैं कुछ रंगीन छीटें
ताकि विभ्रम की स्थिति में
मुझे सत्य बता सकें .

कांच के उस पार से
तुम्हे देखना अच्छा लगता है
अच्छा लगता है तुम्हारी
अनसुनी बातों का
खुद के हिसाब से अर्थ लगाना ..

नीरज कुमार नीर 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 796

Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 27, 2014 at 12:09pm

आदरणीय नीरज जी इस शानदार रचना पर तहे दिल बधाई सादर

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 26, 2014 at 11:29pm

हम को मैं और तुम करती इस दीवार को बहुत सुन्दरता से बयां करती पंक्तियाँ, बधाई आदरणीय नीरज जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 26, 2014 at 7:29pm

आदरनीय नीरज भाई , रिश्तों की विषमताओं को जीती आपकी रचना सुन्दर और स्वाभाविक लगी , आपको बधाइयाँ ॥

Comment by नादिर ख़ान on June 25, 2014 at 11:02pm

तुम्हारे और मेरे बीच है 
कांच की एक मोटी दीवार 
जो कभी कभी अदृश्य प्रतीत होती है 
और पैदा करती है विभ्रम 
तुम्हारे मेरे पास होने का

आदरणीय नीरज जी  शानदार शुरुआत की आपने कविता की और उतनी ही उम्दगी से इसे अंत तक निभाया

कांच के उस पार से 
तुम्हे देखना अच्छा लगता है 
अच्छा लगता है तुम्हारी 
अनसुनी बातों का 
खुद के हिसाब से अर्थ लगाना .. बहुत  उम्दा ..

 

Comment by annapurna bajpai on June 25, 2014 at 6:05pm

बहुत खूब , बधाई आपको । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 24, 2014 at 5:26pm

बहुत सुन्दर रचना ....बधाई नीरज जी 

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