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मुझको तो गुज़रा ज़माना चाहिए।

फिर वही बचपन सुहाना चाहिए।

 

जिस जगह उनसे मिली पहली दफा,

उस गली का वो मुहाना चाहिए।

 

तैरती हों दुम हिलातीं मछलियाँ,

वो पुनः पोखर पुराना चाहिए।

 

चुभ रही आबोहवा शहरी बहुत,

गाँव में इक आशियाना चाहिए।

 

भीड़ कोलाहल भरा ये कारवाँ,

छोड़ जाने का बहाना चाहिए।

 

सागरों की रेत से अब जी भरा,

घाट-पनघट, खिलखिलाना चाहिए।

 

घुट रहा दम बंद पिंजड़ों में खुदा,

व्योम में उड़ता तराना चाहिए।

 

थम न जाए लेखनी यह ‘कल्पना’

गीत गज़लों का खज़ाना चाहिए।

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by कल्पना रामानी on July 10, 2014 at 6:40pm

प्रिय प्राची जी, उत्साहवर्धक शब्दों के लिए सादर धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on July 10, 2014 at 6:39pm

आपकी मनोबल बढ़ाती हुई सुंदर टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय सौरभ जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 10, 2014 at 2:18pm

अपनी सुकोमल चाहतों को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं 

हार्दिक बधाई आदरणीया कल्पना जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 7, 2014 at 6:39pm

एक भरपूर, आबाद और सशक्त ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया कल्पनाजी.

सादर

Comment by कल्पना रामानी on July 5, 2014 at 9:08am

सभी आदरणीय मित्रों की प्रोत्साहित करती हुई सुंदर टिप्पणियाँ पढ़कर हार्दिक प्रसन्नता हुई, आप सबका स्नेह ही मेरा संबल है। आप सबका सादर आभार।

Comment by mrs manjari pandey on July 3, 2014 at 9:04pm
आदरणीया कल्पना जी बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई
Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 3, 2014 at 3:25pm
आदरणीया कल्पना जी ..अतीत की सुनहरी यादों में डुबोती आपकी यह रचना आपके लेखन के अतीत के अपनी सभ्यता संस्कारों से जोड़ने वाली रचनाओं की माला की एक शानदार कड़ी है ..आपके ख्वाब पूरे हों आपको गीतों ग़ज़लों का खज़ाना मिले तो हम भी उस खजाने से मालामाल हो सकें इसी कामना और हार्दिक बध्गाई के साथ सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Tilak Raj Kapoor on July 3, 2014 at 1:25pm

बहुत खूब कल्‍पना जी। 

Comment by वेदिका on July 1, 2014 at 11:25pm
जिस जगह उनसे मिली पहली दफा,
उस गली का वो मुहाना चाहिए। ..... क्या खूब मासूम जिद से भरा शेर
चुभ रही आबोहवा शहरी बहुत,
गाँव में इक आशियाना चाहिए। .... बहुत खूब चाह
मतले से मक्ता तक बहुत शानदार गजल!
बधाई आ0 कल्पना दीदी!
Comment by vijay nikore on July 1, 2014 at 4:17pm

बहुत ही खूबसूरत गज़ल के लिए हार्दिक बधाई।

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