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हाँ..! कुछ तो बाकी है (अतुकांत)

आज कुछ....

आहट सी हुई, उस बंद

वीरान अन्धेरें से कोने में

जहाँ कभी

खुशियों की रौशनी थी

क्यों..?

आज उस बेजान लगने वाली

बंजर भूमि में

नमी सी आ गई

और दिखने लगा

एक आशा का अंकुरण

उस अंकुर में

जो कभी

हमने मिल कर

बोया था

हमारे वर्तमान और भविष्य

की छाँव

और फल के लिए

हाँ..! कुछ तो बाकी है

जो अमिट रहा

शायद....!

यही  तो रिश्ता होता है,

जो कि बड़ी

मुश्किलों से बनता है...

           जितेन्द्र'गीत'

   (मौलिक व् अप्रकाशित)

.

 

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Comment

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 3, 2014 at 11:29am

आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु आपका हार्दिक आभारी हूँ आदरणीया प्रियंका जी

सादर !

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 3, 2014 at 11:29am

रचना पर आपकी सराहना हेतु आपका ह्रदय से आभार, आदरणीय डा. गोपाल जी .स्नेह बनाये रखियेगा

सादर !



Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 2, 2014 at 10:31pm

आपने रचना को मान दिया, आपका ह्रदय से आभार आदरणीय शुशील जी. स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 2, 2014 at 10:26pm

आपकी बधाई सहर्ष स्वीकार है आदरणीय लक्ष्मण जी, स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 2, 2014 at 10:25pm

आपके उत्साहवर्धक अनुमोदन हेतु आपका ह्रदय से आभारी हूँ आदरणीय शिज्जू जी. स्नेह बनाये रखियेगा

सादर!

Comment by Priyanka singh on July 2, 2014 at 5:12pm

अच्छी रचना .... बधाई आपको 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 2, 2014 at 3:01pm

जीतू जी

बहुत सुन्दर भाव i

हाँ..! कुछ तो बाकी है

जो अमिट रहा

शायद....!

यही  तो रिश्ता होता है,

जो कि बड़ी

मुश्किलों से बनता है...

Comment by Sushil Sarna on July 2, 2014 at 11:29am


एक आशा का अंकुरण
उस अंकुर में
जो कभी
हमने मिल कर
बोया था
हमारे वर्तमान और भविष्य
की छाँव
और फल के लिए
हाँ..! कुछ तो बाकी है
जो अमिट रहा
शायद....!
यही तो रिश्ता होता है,
जो कि बड़ी
मुश्किलों से बनता है...
…………… बेहद खूबसूरत भावों की दिलकश अभिव्यक्ति .... सीधे शब्दों में सीधी बात .... इस सुंदर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय जितेन्द्र जी

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 2, 2014 at 10:50am

आ०  जीतेन्द्र  भाई रिश्तों की बेहतरीन व्याख्या करती इस रचना के लिए हार्दिक बधाई l


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 2, 2014 at 8:15am

वाह आदरणीय जितेन्द्र भाई बहुत खूबसूरत रचना है रिश्तों की बड़ी अच्छी व्याख्या की है आपने बहुत बहुत बधाई

कृपया ध्यान दे...

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