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चारो तरफ चीख़ पुकार मची हुई थी, सभी बदहवास भाग रहे थे । जिधर देखो आग ही आग । ख़ून और मांस जगह जगह बिखरा पड़ा था |  

थोड़ी ही देर में इलाक़ा पुलिस और मीडिया के लोगों से भर गया । बम डिस्पोजल स्कवॉड भी आ गया । पूरे शहर में तनाव फ़ैल गया क्योंकि विस्फ़ोट की जगह एक धर्मस्थल के पास थी और अफ़वाहें पूरे जोरों पर थीं ।

पर इन सबसे बेख़बर, एक बूढ़ा भिखारी अपनी जगह पर शांत बैठा हुआ था । किसी को नहीं पता था कि वो किस मज़हब का है , सबके आगे हाँथ फैलाना और कुछ मिल जाने पर दुआ देना, बस इतना ही जानता था वो । बड़े और बिखरे हुए बाल और दाढ़ी उसकी पहचान थे । लेकिन आज उसी मोहल्ले के एक कोने में कुछ लोग आपस में फ़ुसफ़ुसा रहे थे "वो जरूर उसी मज़हब का है, मौका है इस विस्फ़ोट का बदला ले लेते हैं ।

अगले दिन लोगों ने देखा कि इंसानियत का एक बार फिर खून हो गया था |

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on August 11, 2014 at 6:51pm

आभार विजय मिश्रजी ..

Comment by विजय मिश्र on August 11, 2014 at 12:38pm
मनुष्य धर्म जैसे व्यापक अस्तित्व को जातीय संकीर्णता में जबसे लपेटा है ,आपने सही लिखा ,मानवीयता लाश बन चुकी है |सामयिक और सटीक |आभार
Comment by विनय कुमार on August 11, 2014 at 12:20am

आभार जवाहर लाल जी..

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 10, 2014 at 9:38pm

आज के हालात पर सही चोट की है आपने!

Comment by विनय कुमार on August 10, 2014 at 12:32pm

आभार जितेंद्रजी..

Comment by विनय कुमार on August 10, 2014 at 12:32pm

आभार सौरभ जी , आप का उत्साहवर्धन अच्छा लगा |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 10, 2014 at 11:32am

ऐसे कुकृत्य किसी धर्म की सीख कत्तई नहीं हैं. लेकिन आज के दुराग्रहियों द्वारा धर्म की जो और जैसी व्याख्या की जा रही है, उसकी परिणति अवश्य है. सर्वसमाहिता जोकि किसी उच्च धर्म अथवा मानवीय कर्तव्य का अन्योन्याश्रय भाग हुआ करती है, आज की व्याख्याओं में सिरे से ग़ायब है.

लघुकथा के इंगित केलिए हृदय से बधाई, भाईजी.

भाई शुभ्रांशुजी का सुझाव ध्यातव्य है.

शुभ-शुभ

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 10, 2014 at 10:40am

बहुत अच्छी लघुकथा कही आपने, मन को झंझोड़ देती हुई. बधाई स्वीकारें आदरणीय विनय जी

Comment by विनय कुमार on August 10, 2014 at 12:26am

आभार राजेश कुमारीजी..

Comment by विनय कुमार on August 10, 2014 at 12:25am

आभार सुभ्रांशुजी ।

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