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आज़ादी और दीवाने (लघुकथा)

बाजार से गुजरते हुए उसने एक बहेलिए के पास पिंजरे में कैद कुछ पंछी देखे। बहेलिए को पैसे देकर उसने पिंजरा खोल दिया। पिंजरा खुलते ही एक पंछी फुर्र से उड़ता आसमान की तरफ लपका। अनायास कुछ चीलें आई और उन्होनें उस पंछी को दबोच लिया। उड़ने के लिए तैयार बाकी पक्षी सहम कर पिंजरे में दुबक गए।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Ravi Prabhakar on August 15, 2014 at 2:39pm

आदरणीय विजय शंकर जी,
लघुकथा पर आपकी उपस्थिती हेतु धन्यवाद। आपने अपने बहुमूल्य समय में से जो समय लघुकथा को दिया व इसमें छुपे संदेश को समझा उस हेतु भी धन्यवाद। कृपा भविष्य में भी स्नेह बनाए रखें।

Comment by Ravi Prabhakar on August 15, 2014 at 2:35pm

आदरणीय जितेन्द्र भाई,
आपकी बधाई सिर-माथे पर। लघुकथा की प्रशंसा हेतु धन्यवाद मित्रवर ।

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 15, 2014 at 1:00pm
आदरणीय रवि प्रभाकर जी, कहानी अच्छी है , सच्ची भी है , आज़ादी की कीमत बहुत होती है और चुकानी भी पड़ती है .
बधाई.
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 15, 2014 at 12:59pm

आपकी लेखनी को नमन ,आदरणीय रवि जी. बहुत ही कम शब्दों में आपने आजादी को परिभाषित कर दिया :))

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