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Ravi Prabhakar's Blog (31)

सिसकियां (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

‘चल अब छोड़, जाने भी दे! इसमें इतना रोने की क्या बात है, यह कोई नयी बात थोड़े ही है। हम जैसे लोगों के साथ तो ये हमेशा से ही होता आया है। तू इतने टेसुए क्यों बहा रही हो ? वैसे गल्ती भी तेरी ही है, अगर तुझे प्यास लगी थी तो अपने पीने का पानी बाहर ही तो रखा होता है फिर तू रसोईघर में क्यों गई ?’ सिसक रही अपनी पत्नी को वो दिलासा दे रहा था।

‘मैं तो यही सोच कर इनके यहां काम करने को लगी थी कि चलो पढ़-लिख कर अफसर बन गए है तो क्या हुआ, हैं तो ये हम लोगों में से ही ना। पर ये लोग... कोई और हमारे…

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Added by Ravi Prabhakar on January 18, 2016 at 9:00pm — 8 Comments

मुखौटे (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

 ‘बेशक हमारे भाई साहिब को देश छोड़े एक अर्सा हो गया यू.एस.ए. में उन्होनें अपना बिजनेस एम्पायर खड़ा कर लिया है पर उन्हें अपने देश और अपनी संस्कृति से अब भी बहुत प्यार है। इसलिए वो अपने बेटे के लिए मेम नहीं बल्कि एक सुसंस्कृत भारतीय बहू चाहते है।’ शहर के नामचीन बिल्डर अपनी डाॅक्टर पत्नी सहित मेयर साहिब के घर उनकी इकलौती बेटी के लिए अपने भतीजे के रिश्ते के सिलसिले के लिए बतिया रहे थे।

‘यह तो बहुत अच्छी बात है। मेरी बहन व बहनोई भी यू.एस.ए. सिटीज़न हैं । वो आपके भाई साहिब को बहुत…

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Added by Ravi Prabhakar on December 19, 2015 at 1:46pm — 9 Comments

संत्रास (लघुकथा) : रवि प्रभाकर

ढलती शाम के वक्त खचाखच भरी बस में सेंट की खूशबू में लबालब जैसे ही वह दो लड़कियां चढ़ी तो सभी का ध्यान उनके जिस्म उघाड़ू तंग कपड़ों की ओर स्वत ही खिंचता चला गया । बस की धक्कमपेल का नाजायज़ फायदा उठाते हुए कुछ छिछोरे किस्म के लड़के रह रह कर उन्हे स्पर्श करते हुए बीच बीच में कुछ असभ्य कमेंट भी कर रहे थे परन्तु वो दोनों लड़कियां इन सबसे बेपरवाह आपस में हँस-हँस कर बातें करने में व्यस्त थीं।

‘इधर बैठ जाओ बेटी !’ सीट पर बैठा हुआ एक बुर्जुग बच्चे को सीट से अपनी गोद में बिठा कर थोड़ा एक तरफ…

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Added by Ravi Prabhakar on July 21, 2015 at 8:30am — 22 Comments

चट्टे-बट्टे (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

‘मंत्री जी ! ‘भाई’ अब फिर से नयी ‘डिमांड’ कर रहा है। पिछले हफ्ते डी.आई.जी. साहिब को ‘सेवा’ पहुँचाई है और अभी ‘पार्टी फंड’ भी जमा करवाना है । आपको तो पता ही है कि आपके इलेक्शन के वक्त भी हम किसी भी तरह पीछे नहीं हटे थे।  तो फिर कभी ‘भाई’ तो कभी पुलिस।  ऐसे कैसे चलेगा ?’

‘अरे परेशान काहे हो रहे हो। अब अकेले तुम्हारी वजह से ही तो इलेक्शन नहीं न जीते हैं हम... सभी ने साथ दिया था हमारा और ध्यान भी तो सभी का ही रखना पड़ेगा ना। और तुम घबरा काहे रहे हो, ऊ ससुरा जो पुल बना रहे हो ना उसमें से दो…

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Added by Ravi Prabhakar on July 18, 2015 at 12:08am — 9 Comments

सेवानिवृत्ति (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

‘अरे बहू ! चाय नहीं लाई अभी तक, और अखबार कहाँ है, मेरा शेव का सामान भी नज़र नहीं आ रहा।

‘बाबू जी, पहले बच्चों को तैयार करके स्कूल भेज दूँ फिर आपके लिए चाय बनाती हूँ। अखबार तो अभी मुन्नी के पापा पढ़ रहें है आप बाद में आराम से पढ़ लेना। और अब आपको हर रोज़ दाढ़ी बनाने की क्या ज़रूरत ही ? आपको अब कौन सा दफ्तर जाना है।’…

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Added by Ravi Prabhakar on July 12, 2015 at 11:00am — 11 Comments

रद्दी (लघुकथा)/रवि प्रभाकर

‘इन किताबों की जिल्दें उखाड़ कर गत्ता अलग करो, और इन पैक की हुई किताबों को भी खोलो।‘ कबाड़ की दुकान का मालिक अपने नौकरों को आदेश दे रहा था
‘ये इतनी सारी रद्दी कहाँ से ले आए ?’ एक नौकर ने पूछा
‘वो जो पीछे लाल कोठी वाले साहिब हैं न, जो विश्वविद्यालय में साहित्य विभाग के अध्यक्ष हैं, उन्हीं के घर से लाया हूँ।’
(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on May 26, 2015 at 2:57pm — 11 Comments

मुक्ति (लघुकथा)/रवि प्रभाकर

‘आज तो लाला ने भी और मोहलत देने से साफ मना कर दिया । समझ नहीं आ रहा अब क्या होगा? बैंक की किश्तें, अगले महीने छोटी की शादी... इस बेमौसमी बरसात ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा ।’ साहूकार की दुकान से बाहर निकलते हुए परेशानी के आलम में वो अपने साथी से बोला
‘सब्र से काम लो भाई ! अब जो भगवान को मंजूर ... अरे ! उधर क्या करने जा रहे हो ... उस तरफ तो बाजार है ?’
‘एक रस्सी लेने...।’

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on May 13, 2015 at 8:18am — 23 Comments

अर्जी (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

‘जी अब तो पेन्शन की अर्जी पास हो जाएगी ना ?’

अपने कपड़ों को ठीक करते हुए कमरे से बाहर निकलती हुई शहीद फौजी की विधवा ने मंत्री जी के पी.ए. से पूछा
‘अब तो काम हुआ ही समझो ! बस यह अर्जी कल एक बार डाॅयरेक्टर साहिब के पास भी ले जानी होगी'।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on May 8, 2015 at 11:00am — 19 Comments

व्यवस्था (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

कौआ एक बार फिर प्यासा था। बहुत ढूंढने पर उसे फिर एक घड़े में थोड़ा सा पानी दिखाई दिया। एक बार फिर उसने पास पड़े कंकड़-पत्थर उठा उसमें डाले और जैसे ही पानी उसकी पहुँच तक आया तभी कुछ ताकतवर कौऐ एक झुंड में उस पर टूट पड़े और उसे वहां से खदेड़ कर उस पानी पर कब्जा कर लिया। बेचारा प्यासा कौआ एक बार फिर से पानी की तलाश में जुट गया।

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(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on September 11, 2014 at 12:00pm — 8 Comments

पुण्‍य (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

शहर के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त डाॅक्टर के नेतृत्व में एक बहुत बड़ा ‘मुफ्त मैडीकल कैंप’ आयोजित किया गया। जहाँ मुफ्त चैकअप करवाने वालों का हजूम उमड़ आया था। डाॅक्टर साहिब व उनकी टीम को निस्वार्थ भाव से सैकड़ों मरीजों का चैकअप करते देख सभी उनकी मुक्त कंठ से सराहना कर रहे थे।



उसी…
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Added by Ravi Prabhakar on August 26, 2014 at 11:30am — 10 Comments

आज़ादी और दीवाने (लघुकथा)

बाजार से गुजरते हुए उसने एक बहेलिए के पास पिंजरे में कैद कुछ पंछी देखे। बहेलिए को पैसे देकर उसने पिंजरा खोल दिया। पिंजरा खुलते ही एक पंछी फुर्र से उड़ता आसमान की तरफ लपका। अनायास कुछ चीलें आई और उन्होनें उस पंछी को दबोच लिया। उड़ने के लिए तैयार बाकी पक्षी सहम कर पिंजरे में दुबक गए।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on August 15, 2014 at 12:30pm — 14 Comments

एक बड़ा हादसा (लघुकथा)

फैक्ट्री में हुए एक भयानक हादसे में उसे अपनी दोनों टाँगे गंवानी पड़ गई, जबकि उसके तीन साथियों को जान से हाथ धोना पड़ा था.
"तुम्हें ठीक होनें में तो अभी बहुत समय लगेगा, जबकि एक महीने के बाद ही तुम्हारी रिटायरमेंट है। इसलिए मैनेजमेंट ने फैसला किया है कि तुम्हें एक महीना पहले ही रिटायर कर दिया जाए।”  उसका हाल चाल पूछने आए सहकर्मियों में से एक ने उसे सूचित किया

“चलो कोई बात नहीं यार, भगवान…
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Added by Ravi Prabhakar on August 12, 2014 at 6:00pm — 20 Comments

अंधे अंधा ठेलिया (लघुकथा) - रवि प्रभाकर

“अबे ये बकरी किसकी बंधी हुई है यहाँ ?”
“ज़मींदार साब, ये बदरू की बकरी है, खेत में घुस कर नुस्कान कर रई थी तो पकड़ लाये।“
“अच्छा किया, इन सालों को औकात भूल गई है अपनी।“
“सच कहा सरकार, ऊपर से सरकार ने इन लोगों का और भी दिमाग खराब कर रखा है।“
“तो चढायो आज हांडी पर इस ससुरी बकरिया को।“
“मगर सरकार बदरू तो जात का......”
“अबे मूरख आदमी, जात-पात तो इंसानों की होती है जानवरों की नहीं।”

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on August 6, 2014 at 11:00am — 13 Comments

अभागे (लघुकथा) - रवि प्रभाकर

प्रैस काफ्रेंस देर शाम तक चली। बाल श्रम उन्मूलन के तहत आजाद करवाये बाल श्रमिकों को पुलिस प्रेस के समक्ष लाई थी। फोटो खींचे गए, भाषण दिया गया और थानेदार साहिब का साक्षात्कार भी लिया गया। पत्रकार काफ्रेंस के बाद चाय नाश्ता कर अपने घर की ओर जा रहे थे तो सुबह से भूखे बैठे बाल श्रमिकों की ओर देखकर एक कांस्टेबल धीरे से थानेदार साहिब के कान में फुसफुसाया:

“साहिब! अब इन बच्चों का क्या करना हैे?”

”बड़े साहिब की बिटिया की शादी है अगले हफ्ते, कितना काम होगा वहाँ, छोड़ आयो वहीँ पे इन ससुरों…

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Added by Ravi Prabhakar on August 2, 2014 at 11:00am — 19 Comments

अनुशासन (लघुकथा) / रवि प्रभाकर

“आज तो आप कुछ ज्यादा ही देर से आईं है, आपने तीन पीरीयड मिस कर दिए"  सरकारी स्कूल की अध्यापिका ने दूसरी अध्यापिका से कहा

“क्या बताऊँ, मुन्ने के स्कूल में आज ‘पेरेन्ट-टीचर मीट’ थी, सो वहाँ जाना बहुत ही जरूरी था, अब आप तो जानती ही हैं कि कान्वेंट स्कूलों में अनुशासन का कितना ध्यान रखा जाता है।”

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on July 15, 2014 at 12:30pm — 7 Comments

सदा सुहागन (लघुकथा) रवि प्रभाकर

“बहन ! ये औरतें गठड़ियों में क्या ले जा रही हैं ?”
”विधवा औरतों के लिए कैंप लगा है, वहां उन्हें महीने भर का राशन बांटा जा रहा है।”
पिछले तीन दिन से भूखी सुखिया ने नशे में धुत्त लेटे अपने पति को ऐसे देखा मानो आज  उसे अपने “सुहागन” होने पर पछतावा हो रहा था.

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on July 5, 2014 at 1:00pm — 9 Comments

प्लस्टिक की श्रद्धा (लघुकथा) रवि प्रभाकर

“अरे ये क्या, प्लास्टिक का हार ?” काम से वापिस आए पति के थैले में से खाने का डिब्बा निकालते हुए उसने पूछा
“हां, मां-बाबू जी की फोटो पर रोज फूलों का हार चढ़ाने की बजाए ये हार पहना दो, मुरझाएगा भी नहीं और मैला होने पर धुल भी जाएगा।” उसने एक ही चारपाई पर फटे कंबल के सहारे ठंड से संघर्ष करते हुए अपने तीनों बच्चों की ओर देखकर कहा

Added by Ravi Prabhakar on June 27, 2014 at 3:40pm — 12 Comments

दंश (लघुकथा) रवि प्रभाकर

“बहन ! आज मुझे काम से लौटने में देर हो जाएगी, तब तक तुम मुन्नी को अपने पास ही रखना।" उस विधवा ने हाथ जोड़ते हुए अपनी पड़ोसन से आग्रह किया।
“पर अब तो तेरा देवर भी गाँव से आया हुआ है, तो फिर.....।”
”इसीलिए तो तुम्हारे पास छोड़ रही हूँ."

Added by Ravi Prabhakar on June 24, 2014 at 1:00pm — 19 Comments

सूचना क्रांति (लघुकथा) रवि प्रभाकर

कुछ ही मिनट पहले विदेश में जन्मे अपने पौत्र की तस्वीरें इंटरनेट पर देख रहे दंपति को खुशी से झूमते देखकर  कोने में बैठा घर का नौकर भी अपने बेटे के कद काठ के बारे कयास लगा रहा था जिसे वह कुछ साल पहले गांव छोड़कर नौकरी के लिए शहर आ गया था।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on June 20, 2014 at 10:30am — 11 Comments

वफादारी (लघुकथा) रवि प्रभाकर

मालिक और महा प्रबंधक कंपनी में चल रही हड़ताल को लेकर कुछ गंभीर विचार विमर्श कर रहे थे कि अचानक कुछ आवारा कुत्ते बंगले के अंदर आ घुसे। साहिब का खूंखार पालतू कुत्ता बड़ी फुर्ती से उन आवारा कुत्तों पर झपटा और उन्हें दूर तक खदेड़ आया, तभी एक नौकर धीरे से मालिक के कान में आकर फुसफुसाया

“साहिब,  वो यूनीयन के दूसरी तरफ वाले लीडर आ गए है।”

मालिक के तनावग्रस्त चेहरे पर एकाएक कुटिल मुस्कुराहट आ गई, और उसने मांस का एक बड़ा सा टुकड़ा अपने वफादार कुत्ते के आगे फैंक दिया…

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Added by Ravi Prabhakar on June 14, 2014 at 11:59am — 14 Comments

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