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सदा सुहागन (लघुकथा) रवि प्रभाकर

“बहन ! ये औरतें गठड़ियों में क्या ले जा रही हैं ?”
”विधवा औरतों के लिए कैंप लगा है, वहां उन्हें महीने भर का राशन बांटा जा रहा है।”
पिछले तीन दिन से भूखी सुखिया ने नशे में धुत्त लेटे अपने पति को ऐसे देखा मानो आज  उसे अपने “सुहागन” होने पर पछतावा हो रहा था.

(मौलिक और अप्रकाशित)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 11, 2014 at 12:21am

सुखिया की आँखों से उफनता निठल्ले पति के लिए तिरस्कार को जिन शब्दों में बाँधा गया है उसके लिए संवेदनशील हृदय चाहिये.

इस सफल लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई भाईजी.

इसके साथ ही, आदरणीय़ शरदिन्दु जी ने बहुत ही मार्के की बात उठायी है. इसका अवश्य संज्ञान में लें.

शुभ-शुभ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on July 10, 2014 at 1:33am
एक अच्छी लघुकथा....लेकिन....एक प्रश्न उठता है मन में. यह रचना मौलिक और अप्रकाशित है ऐसी घोषणा नहीं की गयी है. क्या रचनाओं को पोस्ट करने के नियम में फेर-बदल हुआ है? - शरदिंदु
Comment by अरुन 'अनन्त' on July 6, 2014 at 5:15pm

वाह आदरणीय सुखिया मौन रहकर भी कितना कुछ कह रही है, बेहतरीन लघुकथा हार्दिक बधाई स्वीकारें.

Comment by Shubhranshu Pandey on July 6, 2014 at 4:02pm

आदरणीय रवि जी, 

सुखिया के दुःख को बडे़ मर्मिक ढंग से उकेरा है...बधाई.

सादर.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 6, 2014 at 12:37pm

रवी जी 

आपने सुन्दर लोक कथा  बुनी है i शिल्प बहुत अच्छा हैi

Comment by विनय कुमार on July 6, 2014 at 12:24am

बेहतरीन लिखा है आपने , साधुवाद..

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 5, 2014 at 10:12pm

सच ही है ऐसे पति से , पति का न होना बेहतर. बहुत बढ़िया लघुकथा आदरणीय रवि जी हार्दिक बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 5, 2014 at 7:14pm

सच ये लघु कथा अन्दर तक झिंझोड़ देती है ...अपना सन्देश छोड़ने में कामयाब लघु कथा बहुत बढ़िया |आपको बधाई आ० रवि प्रभाकर जी |

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 5, 2014 at 4:35pm

kuchh log gaali hote hain jeewan ke liye ,,,,,,,,,,,,,,,, achhhi lagi,,,,,,,,,,,, badhai..............

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