पृथ्वी की धुरी के इशारों पर
यूं तो नाचता है समय...
विस्मृत क्षण हो गए धूमिल
कई दिनों से गुम था समय...
कितने ही वर्षों से ढूंढता
पूछता था जिससे वो कहता
“मेरे पास तो नहीं है समय...”
समय को खोजते खोजते
अपने प्रियजनों के हृदय की
सीमा को भी लांघ गया...
कहीं भी ना मिला समय....
हार के लौटा घर में,
आश्चर्यचकित फिर हुआ मैं !!
समय तो मेरी मुट्ठी में सिकुड़ा था
मेरे परिवार के हर सदस्य से
मिलने को आतुर था – मेरा समय ||
(मौलिक और अप्रकाशित)
Comment
आदरणीय डॉ. विजय शंकर जी, बधाई हेतु आपका हार्दिक आभार |
चंद्रेश जी
समय की कमी का रोना और समय का सदुपयोग करना एक दुसरे से अलग है i आपकी अभिव्यक्ति इस सत्य को रेखांकित करती है i
बहुत ही सुंदर कविता ..हार्दिक बधाई
sundar prasuti ke liye hardik badhai .....
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