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आपकी ये खामुशी चुभती है नश्तर सी हमें

2122  2122   2122   २१२ 

 

आज ये महफ़िल सजाकर आप क्यूँ गुम हो गये

हमको महफ़िल में बुलाकर आप क्यूँ गुम हो गये

 

पोखरों को पार करना भी  न सीखा है अभी

सामने सागर दिखाकर आप क्यूँ गुम हो गये

 

लहरों से डरकर खड़े थे हम किनारों पर यहाँ

हौसला दिल में जगाकर आप क्यूँ गुम हो गये

 

तीरगी के साथ में तूफ़ान भी कितने यहाँ

इक दफा दीपक जलाकर आप क्यूँ गुम हो गये

 

आपकी ये खामुशी चुभती है नश्तर सी हमें

हमको यूं अपना बनाकर आप क्यूँ गुम हो गये

इक ज़माने बाद ओंठो पे मेरे मुस्कान थी 

मीत यूं  हमको रुलाकर आप क्यूँ गुम हो गये 

मौलिक व अप्रकाशित 

 

 

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Comment by कंवर करतार on September 24, 2014 at 9:34pm

'लहरों से डरकर खड़े थे हम किनारों पर यहाँ

हौसला दिल में जगाकर आप क्यूँ गुम हो गये'

 बहुत खूब ,आशुतोश भाई उम्दा ग़ज़ल के लिये बधाई!

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 24, 2014 at 7:30pm
" हमको यूं अपना बनाकर आप क्यूँ गुम हो गये "
बहुत अच्छी ग़ज़ल बनी है , आदरणीय डॉo आशुतोष मिश्रा , बधाई .
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 24, 2014 at 6:16pm
आदरणीय
आपकी गजल से याद आया - रग -रग में जिसके नश्तरे गम के शिगाफ हों
वो क्या बताये दर्द कहाँ है ,कहाँ नहीं ?--- सुन्दर i
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 24, 2014 at 6:16pm
आदरणीय
आपकी गजल से याद आया - रग -रग में जिसके नश्तरे गम के शिगाफ हों
वो क्या बताये दर्द कहाँ है ,कहाँ नहीं ?--- सुन्दर i
Comment by harivallabh sharma on September 24, 2014 at 4:05pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल आदरणीय...

तीरगी के साथ में तूफ़ान भी कितने यहाँ

इक दफा दीपक जलाकर आप क्यूँ गुम हो गये...सभी शेर उम्दा...बधाई आपको.

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