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फूल हमेशा बगिया में ही, प्यारे लगते।

नीले अंबर में ज्यों चाँद-सितारे लगते।

 

बिन फूलों के फुलवारी है एक बाँझ सी,

भरी गोद में  माँ के राजदुलारे लगते।

 

हर आँगन में हरा-भरा यदि गुलशन होता,

महके-महके, गलियाँ औ’ चौबारे लगते।

 

दिन बिखराता रंग, रैन ले आती खुशबू,

ओस कणों के संग सुखद भिनसारे लगते।

 

फूल, तितलियाँ, भँवरे, झूले, नन्हें बालक,

मन-भावन ये सारे, नूर-नज़ारे लगते।

 

मिल बैठें, बतियाएँ इनसे, जी चाहे जब,

स्वागत में ये पल-पल बाँह पसारे लगते।

 

घर से बेघर कभी ‘कल्पना’ करें न इनको,

तनहाई में ये ही खास हमारे लगते।

मौलिक व अप्रकाशित  

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Comment by कल्पना रामानी on October 5, 2014 at 6:51pm

 आदरणीय Dr Ashutosh Mishra जी हार्दिक आभार

Comment by कल्पना रामानी on October 5, 2014 at 6:49pm

आदरणीया seemahari sharma जी बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on October 5, 2014 at 6:47pm

आदरणीय Shyam Narain Verma जी, बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on October 5, 2014 at 6:45pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी, हार्दिक धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on October 5, 2014 at 6:44pm

आदरणीय Neeraj Kumar 'Neer' जी बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on October 5, 2014 at 6:43pm
Comment by कल्पना रामानी on October 5, 2014 at 6:41pm

आदरणीय harivallabh sharma जी प्रोत्साहित करती हुई टिप्पणी  के लिए  बहुत धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on October 5, 2014 at 6:40pm
Comment by कल्पना रामानी on October 5, 2014 at 6:39pm

आदरणीय laxman dhami जी हार्दिक धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on October 5, 2014 at 6:38pm

आदरणीय अखिलेश कृष्ण जी बहुत बहुत धन्यवाद

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