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" अम्बे है मेरी माँ , दुर्गे है मेरी माँ " गुनगुनाते हुए बटोही गली में झाड़ू लगा रहा था | अचानक सामने से एक भीड़ आई और वो किनारे हट गया |
" अरे मिल गया रे झाड़ू " चिल्लाते हुए लोगों का हुजूम , जिसमे कुछ खद्दरधारी भी थे , बटोही की ओर बढ़ा | जब तक वो कुछ समझे , झाड़ू छीन लिया गया था और फिर भीड़ ने बारी बारी से झाड़ू लगाते हुए फोटो खिंचाई | इसी छीना छपटी में बेचारे बटोही का झाड़ू भी टूट गया |
" सर , मेरी फोटो देखी आपने , आजके सांध्यकालीन अखबार में छपी है " , बताते हुए नेताजी बहुत प्रसन्न थे | उधर बटोही नगर निगम में झाड़ू टूट जाने की वजह से झाड़ खा रहा था और गांधीजी की प्रतिमा खामोश थी |

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on October 6, 2014 at 9:22pm

 बहुत बहुत आभार आदरणीया वंदनाजी..

Comment by विनय कुमार on October 6, 2014 at 9:22pm

बहुत बहुत आभार आदरणीया राजेश कुमारीजी..

Comment by विनय कुमार on October 6, 2014 at 9:21pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय जितेंद्रजी..

Comment by विनय कुमार on October 6, 2014 at 9:20pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय गणेशजी बागीजी..

Comment by vandana on October 5, 2014 at 6:32am

जबर्दस्त व्यंग्य आदरणीय .... तीन फुट की जगह में 7-8 झाडू !!!! सफाई की  इसी सच्चाई को व्यक्त करती है 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 4, 2014 at 10:19am

बहुत जबरदस्त कटाक्ष किया है अभी अखबार में इसी तरह की तस्वीर देख ही रही थी .बहुत- बहुत बधाई. 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 4, 2014 at 9:42am

सामयिक खोखलेपन पर एक करारा प्रहार करती लघुकथा पर हार्दिक बधाई आदरणीय विनय जी


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 3, 2014 at 8:32am

आदरणीय विनय जी, प्रस्तुत लघुकथा करारा तंज करने में सफल है, बहुत बहुत बधाई।

Comment by विनय कुमार on October 2, 2014 at 11:20pm

बहुत बहुत आभार सुलभ अग्निहोत्रीजी..

Comment by Sulabh Agnihotri on October 2, 2014 at 8:48pm

वाह ! बहुत तीखा वार है ।
यही संस्कृति बन गयी है हमारी, काम नहीं करते - सिर्फ काम का दिखावा करते हैं और प्रयास होता है कि सारा श्रेय फोकट में बटोर ले जायें।
बधाई !

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