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एक व्यवस्थित इंटरप्राइज़-डा० विजय शंकर

अच्छे काम का प्राइज़ हो न हो
बेईमानी एक व्यवस्थित इंटरप्राइज़ है .
बेईमानी स्वयं बड़ी ईमानदारी से होती हैं .
सिद्धांतों , आदर्शों में नहीं , व्यवहार में होती है .
इसीलिये लोग किसी को यह सलाह नहीं देते
कि बेईमान बनो, कहते हैं व्यवहारिक बनो .

व्यवहार का नेटवर्क कितना भी गहन क्यों न हो
व्यवस्था का हर अंग अकेला माना जाता है ,
कोई अदना या सरगना कभी पकड़ा भी जाए ,
वह स्वतन्त्र, अकेला इंटरप्रिन्योर माना जाता है .
सजा सिर्फ उसे होती है ,चाहे जितनी भी देर से हो .
उसके कमती होने से नेट कमजोर नहीं होता है .
व्यवस्था का कभी कहीं भी कोई दोष नहीं होता है ,
उसे बदलने का जिक्र या कोई आक्रोश नहीं होता है .
व्यवहार बना रहता है , कारोबार चलता रहता है .
सजा इकलौते को होती है,भले ही वह व्यवस्था का
जनक हो , नायक हो या सर्वेसर्वा हो .

उसके अपना उत्तराधिकारी चुनने का नैसर्गिक
अधिकार प्रयोग करने का अधिकार बना रहता है.
उसकी बनाई लंका सारी ईमानदार मानी जाती है,
वह वैसे ही बनी रहती है और चलती रहती है .
क्योंकि बेईमान अकेला इंटरप्रिन्योर होता है ,
व्यवस्था का कहीं कभी कोई दोष नहीं होता है .

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on October 7, 2014 at 10:04pm
आदरणीय महिमा श्री जी , आपकी प्रशंसा सादर स्वीकार है , पर यहां कुछ बदलेगा , बस, यही सोचना साकार नहीं हो पाता है . बस एक कोशिश है जो हम करते रहते हैं .
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 7, 2014 at 9:58pm
प्रस्तुति की प्रशस्ति के लिए आभार आदरणीय हरी वल्लभ शर्मा जी . बात कुछ यूँ ही है , जब कोई चीज व्यवहार में आ जाती है तो उसका रूप स्वरुप बन जाता है और वह दोष रहित हो जाती है . व्यवहार इसलिए चलते और पलते हैं क्योंकि हम उन्हें चलाते हैं और उन्हें पालते भी हैं .
Comment by MAHIMA SHREE on October 7, 2014 at 9:39pm

समाज में व्यवहारिकता के नाम पर व्यवस्था के हर मोड़ पर किस तरह से बेईमानी को प्रश्रय दे दिया गया है उसकी अच्छी व्यंगात्मक लहजे में आपने अच्छी खबर ली है ..हार्दिक बधाई आपको सादर 

Comment by harivallabh sharma on October 7, 2014 at 9:08pm

बहुत सुन्दर आदरणीय Dr Vijay Shanker जी बेईमानी का इमानदारी से संचालन ..सत्ता का मूल वही पर दोषी नहीं...सुन्दर तंज देती व्यंजना ..बधाई आपको.

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