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एक बार फिर आओ न वैदेही
फिर राम की बनो सनेही
इस बार उसके साथ वन में मत जाओ
उसे ले चलो किसी शहर की ओर
जहाँ अनगिनत रावण तुम्हारे
अपहरण का स्वप्न सजाये बैठे हैं.
रावण द्वारा अपहृत हो जाओ,
इन नए राक्षसों के विनाश का
तुम फिर से कारण बनो.
एक नया संसार बसाओ
इनका अब संहार कराओ.

तनिक फिर भृकुटि बनालो
राम को फिर से बुला लो.

मौलिक व अप्रकाशित
विजय प्रकाश शर्मा

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Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 10, 2014 at 5:41pm

आ ० डॉ० गोपाल नारायण जी,
सीता का कहा सत्य हो रहा है.अब संहारक चाहिए.
आपकी सराहना के लिए बहुत आभार.सादर.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 10, 2014 at 5:32pm

राम ने कहा- सीते ! धरती पर पाप बहुत बढ़ गया है  i हमें फिर अवतार लेना होगा i

सीता ने उत्तर दिया - सोच लो प्रभु त्रेता में तो एक ही रावण था पर अब----

आपकी कविता  जैसी कामना हम सभी करते है i काश यह सत्य हो जाय i  सुन्दर साभिप्राय रचना i

Comment by वेदिका on October 10, 2014 at 11:05am
अच्छी रचना !! हार्दिक बधाई !!
Comment by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 10, 2014 at 10:28am

बहुत ही प्रासंगिक एवं यथार्थ का दर्शन कराती हुई विचारोत्तेजक रचना  

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 10, 2014 at 12:13am

बहुत- बहुत आभार आ ० शिज्जु शकूर जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 9, 2014 at 10:11pm

आदरणीय विजय प्रकाश सर बेहतरीन रचना है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 9, 2014 at 12:09pm

आ ० डॉ. विजय शंकरजी,
आपका स्नेह इसी तरह मिलता रहे.बहुत आभार.

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 9, 2014 at 10:24am
एक बार फिर से आ जाओ वैदेही
राम को फिर बुलाओ वैदेही
महा अगर के रावणों
का काल बन जाओ वैदेही ॥
सार्थक रचना . बधाई विजय प्रकाश शर्मा जी .

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