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सहनशक्ति

उदास मन से ही सही,
ले चलो मुझे अपने
उस नरक के अंदर
जिसमे तुम सदियों से
रह रही हो ,
सब दुःख तुम
स्वयं सह रही हो.
एक बार मैं भी तो जानू
स्त्रियों को इतनी
सहनशक्ति
कहाँ से मिलती है?

विजय प्रकाश शर्मा
अप्रकाशित व मौलिक

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Comment

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Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 8, 2014 at 5:22pm

आ ० विजय मिश्रा जी ,
रचना पर आपकी सराहना पाकर धन्य हुआ. बहुत आभार.

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 8, 2014 at 5:19pm

रचना आपको पसंद आयी,आप की सराहना पा गई.बहुत आभार आ ० विजय निकोर जी.

Comment by vijay nikore on October 8, 2014 at 1:20pm

अति सुन्दर। बधाई, आदरणीय विजय जी।

Comment by विजय मिश्र on October 8, 2014 at 12:01pm
आदरणीय ! बहुत कम में कितना कुछ ! हृदयस्पर्शी रचना , आभार |
Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 8, 2014 at 10:54am

आ ० डॉ. विजय शंकरजी,
आपका बहुत आभार , स्नेह बनाये रखें.

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 7, 2014 at 9:45pm
बहुत सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय विजय प्रकाश शर्मा जी, बधाई .
Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 7, 2014 at 12:37pm

आपका बहुत बहुत आभार आ ०  केवल प्रसाद जी,

Comment by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 7, 2014 at 12:36pm

आपका बहुत बहुत आभार आ ० राजेश कुमारी जी.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 6, 2014 at 9:15pm

आ0 विजय भाईजी, सुन्दर अभिव्यक्ति के माध्यम से एक विचारणीय तथ्य प्रकाश में आया।  हार्दिक बधाई स्वीकारें।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 6, 2014 at 6:17pm

आपने चंद पंक्तियों में दिल के उस कौने में झाँकने की कम से कम कोशिश तो की ...बहुत खूब ..सुन्दर रचना बधाई आपको आ० विजय प्रकाश जी |

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