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सर्वव्यापी (लघुकथा)

" त्योहारों के मौसम में इनकी बिक्री बहुत बढ़ गयी है " मुस्कुराते दुकानदारों की बातचीत सुनते हुए उसने देखा, फुटपाथ पर बिछे हुए तमाम देवी देवताओं के चित्र इसकी गवाही दे रहे थे |

" भगवान हर जगह होते हैं , उन्हें खोजने की जरुरत नहीं " , मंदिर में सुना ये प्रवचन उसे याद आ गया |

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on October 31, 2014 at 12:57pm

आभार सौरभ पाण्डेय जी..

Comment by विनय कुमार on October 31, 2014 at 12:57pm

आभार आलोक मित्तल जी..

Comment by विनय कुमार on October 31, 2014 at 12:56pm

आभार राजेश कुमारी जी .

Comment by विनय कुमार on October 31, 2014 at 12:55pm

आभार श्याम नारायण वर्मा जी..

Comment by विनय कुमार on October 31, 2014 at 12:54pm

आभार जीतेन्द्र जी..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 31, 2014 at 12:49am

जिस ओर आपका इशारा है, भाईजी, वह एकदम से स्पष्ट है. दिल से बधाइयाँ..

Comment by Alok Mittal on October 28, 2014 at 10:11am

बहुत सुंदर बात आपकी ...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 28, 2014 at 9:35am

सच कहा ..और दिवाली के बाद ये तस्वीरें कूड़े कचरे के ढेर में पड़ी मिलती हैं ,सुन्दर लघुकथा 

Comment by Shyam Narain Verma on October 27, 2014 at 11:52am

अति सुन्दर लघु कथा। बधाई।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 27, 2014 at 10:21am

बहुत ही महीन विषय को साझा किया आपने. सच! इश्वर हर जगह है  किसी को दीखता है तो किसी को नहीं. बधाई आपको आदरणीय विनय जी

कृपया ध्यान दे...

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