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तुमने बुलाया और मैं चली आई 

मगर तुम भी जानते हो  

न तुमने दिल से बुलाया

 न मैं दिल से आई  

 

अच्छा हुआ जो तुम

मेरी महफ़िल में नहीं आये

क्यूंकि तुम अदब से आ नहीं सकते थे

और मैं औपचारिकतानिभा नहीं सकती थी

 

आयोजन में कस के गले मिले और बोले  

अरे बहुत दिनों बाद मिले हो

अच्छा लगा आप से मिलकर

सुनकर हम दोनों के घरों के पड़ोसी गेट हँस पड़े   

 

 

 सुबह से भोलू गांधी जी की प्रतिमा को

रगड़-रगड़ कर साफ़ रहा है

 परिंदे आज बहुत  खुश हैं

 चलो कम से कम एक साल में तो

उनका शौचालय साफ़ होता है

 

 

गंगा खुश है आज उसे गुदगुदी हो रही है वो हँस रही है   

शायद कोई गंगा दिवस भी घोषित हो जाए

और वो भी

एक औपचारिकता के अध्याय में जुड़ जाए.

--------------------------------

मौलिक एवं अप्रकाशित  

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 16, 2014 at 6:53pm

बहुत- बहुत शुक्रिया सोमेश भैय्या आपको क्षणिकाएँ पसंद आई .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 16, 2014 at 5:58pm
बहुत सुन्दर क्षणिकाएँ हैं बधाई आपको
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 16, 2014 at 5:44pm

तुमने बुलाया और मैं चली आई 

मगर तुम भी जानते हो  

न तुमने दिल से बुलाया

 न मैं दिल से आई  --------------------------- अनमोल  / रत्न

सभी क्षणिकाएं बेहतरीन  i प्रारंभिक तीन का तो कहना ही क्या ?  आदरणीया  i

Comment by somesh kumar on November 16, 2014 at 4:11pm

आदरणीय सारी क्षणिकाएं बहुत सुन्दरता से औपचारिकता का वर्णन करती हैं ,विषय शीर्षक के विपरीत इनमे कोई औपचारिकता नहीं है ,विशेष तौर पर पड़ोसी-गेटों का मिलना तथा गाँधी जी की तस्वीर का धुलना |बधाई स्वीकृत करें |

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