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एक गमले में रोपा गया पौधा

उसका दायरा क्या है

बस वो गमला

जब तक वो गमले में है

कभी वृक्ष नहीं बन सकता

उस पौधे की जड़ों को

गमले से बाहर आना होगा

 

परिन्दों को उड़ना हो

तो उनकी सीमा क्या है

कोई नहीं

असीम आकाश फैला हुआ है

उन्हें अपने पर खोलने होंगे

 

हमें जीना हो तो

पूरी कायनात पड़ी है

हमें

ख़्वाहिशों को परवाज़ देना होगा

सपनो को

उम्मीदों का आकाश देना होगा

पौधे को

वृक्ष का रूप देने के लिये

ज़मीन देनी होगी

हमें

अपने दायरे से बाहर आना होगा

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 21, 2014 at 9:15am

आदरणीय शरदिंदु सर आप जैसे वरिष्ठ सिद्धहस्त रचनाकारों की सराहना आश्वस्त करती है आपका तहेदिल से शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on December 4, 2014 at 2:26am
आदरणीय शिज्जु जी, आपकी रचनाधर्मिता का एक अपरिचित पट प्रकाशमान हो उठा है इस प्रभावशाली अतुकांत कविता में. अभिनंदन स्वीकार करें. सादर.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 30, 2014 at 6:46pm

सर्वप्रथम विलम्ब के लिये आप  सभी से क्षमा चाहता हूँ, मेरे इस छोटे से प्रयास को आप सभी का स्नेह मिला आप सभी का तहेदिल से शुक्रिया

Comment by savitamishra on November 21, 2014 at 8:54pm

बहुत  ही सुन्दर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 21, 2014 at 10:56am

आदरणीय शिज्जु भाई , बढ़िया अतुकांत चिंतन के लिये बधाई ।

Comment by Hari Prakash Dubey on November 20, 2014 at 5:39pm

सकरात्मक सन्देश देती इस रचना के लिए हार्दिक बधाई  श्री शिज्जू जी !

Comment by Shyam Narain Verma on November 20, 2014 at 1:12pm

बहुत  ही सुन्दर प्रस्तुति  //हार्दिक बधाई आपको 

Comment by Sushil Sarna on November 19, 2014 at 7:37pm

वाह आदरणीय शिज्जु शकूर जी वाह एक ऐसी रचना जो कुछ सोचने पर मज़बूर कर देती है आपकी पंक्तियाँ पाठक के अंतस को झकझोरती हैं।

एक गमले में रोपा गया पौधा
उसका दायरा क्या है
बस वो गमला
जब तक वो गमले में है
कभी वृक्ष नहीं बन सकता
उस पौधे की जड़ों को
गमले से बाहर आना होगा .... इस भाव के आगे मैं नतमस्तक सर।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 19, 2014 at 12:36pm

शिज्जू भैय्या

आप जहा भी जाते है कमाल करते है  i अब इस अतुकांत को ही लें i कमाल की रचना है i  बधाई हो i सादर i


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 19, 2014 at 12:08pm

ग़ज़ल कहने वाली कलम आज़ाद नज़्म भी कितनी खूबसूरत कह सकती है, मालूम हुआ। रचना बहुत ही प्रेरणादायक एवं संदेशपरक हुई है, जिस हेतु मेरी हार्दिक बधाई प्रेषित है।

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