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ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुमनाम पिथौरागढ़ी

22  22  22  22  2

टूटने लगे हैं घर शब्दों से
अब तो लगता है डर  शब्दों से

दैर हरम इक हो जाते लेकिन
पड़े दिलों पे पत्थर  शब्दों से

हैं मेरे हमराह ज़रा देखो
ग़ालिब ओ मीर ,ज़फ़र  शब्दों से

बनती बात बिगड़ने लगती है
ऐसे उठे बवण्डर  शब्दों से

फूल अमन के खिलते कैसे अब
दिल आज हुए बन्जर  शब्दों से

मेरी हस्ती गुमनाम -रहे पर 
छाऊँ सबके मन पर  शब्दों से

गुमनाम पिथौरागढ़ी

मौलिक व अप्रकाशित

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 27, 2014 at 11:18am

अच्छी ग़ज़ल हुई है भाई गुमनाम पिथौरागढ़ी जी, हार्दिक बधाई ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 24, 2014 at 11:21am

बहुत खूब ! आ. गुमनाम भाई,  बधाई स्वीकारें ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 24, 2014 at 5:52am

आ. गुमनाम भाई , बहुत खूब ! बहुत बधाइयाँ ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 23, 2014 at 5:46pm

अच्छी ग़ज़ल कही है आदरणीय गुमनाम जी, बधाई क़ुबूल कर लीजिएगा .

Comment by gumnaam pithoragarhi on November 22, 2014 at 7:08pm

danywaad doso....................

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 20, 2014 at 8:37pm

बहुत  उम्दा i शानदार i

Comment by Hari Prakash Dubey on November 20, 2014 at 4:51pm

सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय गुमनाम पिथौरागढ़ी जी , बधाई ।

Comment by Shyam Narain Verma on November 20, 2014 at 1:05pm

" बहुत खूब ! इस सुंदर गजल हेतु बधाई स्वीकारें । "

Comment by Dr. Vijai Shanker on November 19, 2014 at 9:33pm
सब शब्दों का खेल है ,
बात बन जाए शब्दों से ,
बात बिगड़ जाए शब्दों से ,
बहुत सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय गुमनाम पिथौरागढ़ी जी , बधाई ।

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