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"क्या बात, आज क्लास अटेंड नहीं कर रही हो?"
"नहीं यार, एक नया मुर्गा फसा है आज तो बस रेस्टोरेंट और थियेटर।"

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by विनोद खनगवाल on November 27, 2014 at 9:38pm
आदरणीय योगराज जी, समाज की सोच और हर पहलू पर कलम चलाना हमारा कर्तव्य है। आपकी टिप्पणी को मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ। आगे से और बेहतर लिखने की कोशिश करूँगा। धन्यवाद

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 27, 2014 at 11:21am

आपसे हमेशा स्तरीय लघुकथाओं की आशा होती है, उस लिहाज़ से यह बहुत केजुअल सी लघुकथा है भाई विनोद खनगवाल जी.

Comment by विनोद खनगवाल on November 26, 2014 at 2:45pm
आप सभी का धन्यवाद
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 24, 2014 at 11:27am

बहुत बढ़िया सिक्सर मारा बधाई स्वीकारें l


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 23, 2014 at 5:15pm

भाई सोमेश द्वारा कही गयी बात विचारणीय है।

Comment by विनोद खनगवाल on November 23, 2014 at 10:09am

aap sabhi budhijivio ka bahut bahut dhnywad


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 22, 2014 at 6:21pm

आज के दौर के युवा .....कहीं कोई मछली फंसाता है कहीं कोई मुर्गा इस फंसने या फांसने में भागीदार तो दोनों ही हुए न !!!आज के युवा वर्ग पर बढ़िया कटाक्ष .

Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 22, 2014 at 11:36am

ati sunder is rachna par hardik badhaaayee saadar 

Comment by vandana on November 22, 2014 at 4:51am

चरित्र पतन पर बहुत बढ़िया व्यंग्य आदरणीय सोचने पर मजबूर करती है यह रचना कि क्षणिक सुख के पीछे क्यों भाग रही है दुनिया और सुख यदि चिरस्थाई नहीं तो हासिल करके भी प्यास बनी रहेगी शीर्षक के साथ न्य्याय करती खूबसूरत रचना 

Comment by savitamishra on November 21, 2014 at 8:52pm

hhhhhhhhhhhhhhhh ..बढ़िया

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