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"चाची, तुम्हारी बहू को जापे में खिलाने के लिए घी का इंतजाम नहीं हो पाया है अगर थोड़ी सी मदद कर देती तो...."
"देखो बेटा, इस महीने थोड़ा हाथ तंग है।"- चाची ने बात पूरी होने से पहले ही बहाना बना दिया।
शाम को एक थाली को ढके चाची कहीं जा रही थी। उसने पूछा-"चाची, कहाँ जा रही हो?"
"बेटा, वो अपनी गली की कुतिया ने बच्चों को जन्म दिया है। जापे वाली के लिए देसी घी का हलवा बहुत फायदेमंद होता है इसलिए उसके लिए ले जा रही हूँ। बड़ा पुण्य मिलेगा।"

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by विनोद खनगवाल on November 27, 2014 at 9:44pm
आदरणीय योगराज जी सरहाना के लिए दिल से आभारी हूँ।

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 27, 2014 at 11:31am

बहुत ही प्रभावशाली लघुकथा हुई है भाई विनोद खनगवाल जी, हार्दिक बधाई।

Comment by विनोद खनगवाल on November 26, 2014 at 2:43pm
आप सभी आदरणीय सुधीजनों का धन्यवाद
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 24, 2014 at 7:50pm

इसे कहते है कथनी और करनी का अन्तर i

Comment by vijay nikore on November 24, 2014 at 9:07am

लघु कथा अच्छी लगी। बधाई।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 23, 2014 at 5:07pm

तुलनात्मक रूप से कही गयी बात लघुकथा के माध्यम से प्रभाव छोड़ने में सक्षम है, बधाई आदरणीय विनोद जी।

Comment by विनोद खनगवाल on November 23, 2014 at 10:07am

aa. vandana ji, aa. shyam narain ji or aa. somesh ji apka aabhar

Comment by somesh kumar on November 22, 2014 at 10:44am

पाप-पुण्य का ये दायरा व्यक्ति-व्यक्ति के अनुसार बदलता है यही निज जीवन -दर्शन कहलाता है ,सुंदर विषय चयन के लिए बधाई 

Comment by Shyam Narain Verma on November 22, 2014 at 9:58am

बहुत बढ़िया लघुकथा ,बधाई

Comment by vandana on November 22, 2014 at 4:45am

वास्तविकता है यह और विडंबना भी कि पुण्य का संसार जानवरों तक सिमट गया है जबकि शास्त्रों ने मनुष्य समेत पर्यावरण का ध्यान रखने को पुण्य कहा है 

बहुत बढ़िया विषय चयन आदरणीय 

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