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डोभाल जी का मकान बन रहा था, बड़े ही धार्मिक व्यक्ति थे और प्रकृति प्रेमी भी,एक माली भी रख लिया था ,उसका कार्य एक सुन्दर बगीचे का निर्माण करना था ,वह भी धुन का पक्का था , उसने तरह-तरह के फूल ,घास ,पेड़ लगा दिए और कभी –कभी वह  सजावट के लिए रंग बिरंगे पत्थर भी उठा कर ले आता और बड़े अच्छे शिल्पी की तरह उन्हें पौधों के इर्द-गिर्द सजाता ,उस बगीचे में अब तरह तरह के  फूल खिलने लगे थे ,वही नीचे एक बड़ा काला सा पत्थर भी था जिस पर माली अपना खुरपा रगड़ता और पौधों के नीचे से खरपतवार निकालता , अब सब फूल उस पत्थर को हेय दृष्टी से देखते और कहते ,यार कैसा तुच्छ जीवन है तुम्हारा, रोज माली के खुरपे से रगड़े जाते हो,” काला -पत्थर” हमेशा चुप रहता, इधर मकान भी तैयार हो गया ,कुछ दिनों बाद वे सारे पुष्प, गृह-प्रवेश के दिन पूजा की थाली में सजा दिए गए थे ,इधर उसी माली ने उस काले पत्थर को तराश कर शिवलिंग का रूप दे दिया था और डोभाल जी का पूरा परिवार,पंडित जी के मंत्रोचार के साथ  उसकी पूजा कर रहा था और सभी  लोग एक-एक करके उन पुष्पों को उस शिवलिग पर अर्पित करते जा रहे थे I    

© हरि प्रकाश दुबे

 "मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by Hari Prakash Dubey on November 24, 2014 at 8:02pm

 आदरणीया मीना पाठक जी रचना की सराहना के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by Meena Pathak on November 24, 2014 at 2:09pm

शायद  खुरपी की रगड से पत्थर का आकार बदल गया था ..सुन्दर  लघुकथा कही आपने ..सादर बधाई 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 24, 2014 at 11:50am

सुंदर संदेश-पूर्ण कहानी के लिए कोटि कोटि बधाई

Comment by Hari Prakash Dubey on November 24, 2014 at 11:30am

आदरणीय सर ,

आत्मीय प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार,आप की बात सत्य है पर आप तीसरी  पंक्ति पर गौर कीजियेगा "अच्छे शिल्पी की तरह उन्हें पौधों के इर्द-गिर्द सजाता"...मतलब माली भी बहुमुखी प्रतिभा का धनी था ! सादर प्रणाम 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 24, 2014 at 11:02am

हरि प्रकाश जी

सुन्दर कथ्य और तथ्य को दर्शाती कहानी i इसमें एक ही बात  खटकती है पत्थर तराशने का का काम संगकार  का है माली का नहीं  i आश है आप मेरी बात को सकारात्मक रूप से लेंगे i  सादर i

Comment by Hari Prakash Dubey on November 24, 2014 at 10:34am

आपकी आत्मीय प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार सोमेश जी.

Comment by somesh kumar on November 24, 2014 at 9:07am

अदभुत कहानी ,हमें अपने रूप-रंग और आज की बेहतर स्थिति का दम्भ नहीं करना चाहिए और दूसरों का उपहास तो कभी नहीं उड़ना चाहिए ,वो सृजनकर्ता ना जाने किस को क्या रूप दे दे ,दुर्दिन अच्छे हो जाते हैं और अच्छे दुर्दिन |सुंदर संदेश-पूर्ण कहानी के लिए साधुवाद 

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