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तनहा तनहा ही रहना है ! (ग़ज़ल)

२२ २२ २२ २२

फेलुन - फेलुन - फेलुन - फेलुन


तनहा तनहा ही रहना है !
दर्द सभी अपने सहना  है !!

रहता वो अपने मैं गुमसुम !
शांत नदी जैसे बहना है !!

उसको साथ मिला अपनों का !
अब उसको क्या कुछ कहना है

वो है नेता का साला तो !
क्या अब उसको भी सहना है !!

घर से जाते तुमने देखा !
कहिये उसने क्या पहना है !!

लड़का उसका बिगड़ा है तो !
घर फिर तो इसका ढहना है !!

"मौलिक और अप्रकाशित "

** आलोक **

मथुरा

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Comment

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Comment by Alok Mittal on December 13, 2014 at 1:20pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी सर जी आपका दिल से आभार

Comment by Alok Mittal on December 13, 2014 at 12:42pm

आदरणीय ram shiromani pathak जी...आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by Alok Mittal on December 13, 2014 at 12:42pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी...आपका बहुत बहुत शुक्रिया हौसला बढ़ाने के लिए !

Comment by Alok Mittal on December 13, 2014 at 12:41pm

आदरणीय somesh kumar जी दिल से आपका शुक्रिया

Comment by Alok Mittal on December 13, 2014 at 12:41pm

आदरणीय Shyam Narain Verma जी...आपका बहुत बहुत आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 2, 2014 at 9:25pm

आ. आलोक  भाई , बढिया गज़ल हुई है , हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by ram shiromani pathak on December 2, 2014 at 1:09pm

आदरणीय बहुत सुन्दर प्रस्तुति //बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 2, 2014 at 1:33am
बहुत खूब। शानदार ग़ज़ल के लिए आपको हार्दिक बधाई।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 30, 2014 at 4:03pm

सुन्दर ग़ज़ल, अंतिम शेर पर विशेष दाद, दूसरे शेर के मिसरा उला में (मैं) टाइपिंग मिस्टेक लगता है।

Comment by somesh kumar on November 30, 2014 at 9:29am

सुंदर रचना ,तीसरा और अंतिम से'र पर विशेष बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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