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लघुकथा : सुकून (गणेश जी बागी)

                         व्यंग्यात्मक शैली में लिखने के लिए जाना जाता है, उसकी कवितायेँ बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से राजनेताओं पर तीखी मार करती हैं, उसकी कविता प्रतिष्ठित अखबार के साहित्यिक स्तम्भ में आज प्रकाशित हुई है, कल से ही वो परेशान और बेचैन था, जाने क्या होगा, पता नहीं उसकी अभिव्यक्ति को लोग समझ भी पाएंगे अथवा नहीं, रात भर वह सो न सका ।
                        सुबह होते ही मोबाइल की घंटियां बजने लगी, उसका मन शांत था और चेहरे पर सुकून के भाव थे, उसकी अभिव्यक्ति समझ ली गयी थी, गालियों संग धमकियों का दौर चालू हो गया था ।

(मौलिक व अप्रकाशित)
पिछला पोस्ट => अतुकान्त कविता : पगली

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 6, 2014 at 4:11pm

आदरणीय बागी जी , व्यंग्य बाण की मार ऐसे ही होती है , हँसे कि रोये ? सुन्दर लघुकथा के लिये बधाइयाँ ।

Comment by Archana Tripathi on December 6, 2014 at 3:36pm
लोग अभिव्यक्ति खूब समझते है बस अनदेखा कर देते है।बधाई गणेश बागी जी।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 6, 2014 at 1:53pm

सराहना हेतु आभार आदरणीय हरी प्रकाश जी। 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 6, 2014 at 1:53pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन जी, लघुकथा पर आपकी उपस्थिति लघुकथा की सार्थकता को प्रमाणित करती है, उत्साहवर्धन हेतु हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 6, 2014 at 1:50pm

आदरणीय डॉ विजय शंकर जी, उत्साहवर्धन हेतु हृदय से आभार।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 6, 2014 at 1:49pm

आदरणीय सुशील सरना जी, लघुकथा पर आपकी उपस्थिति उत्साहवर्धन करती है, बहुत बहुत आभार। 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 6, 2014 at 1:49pm

सराहना हेतु आभार आदरणीय डॉ आशुतोष जी।

Comment by somesh kumar on December 4, 2014 at 11:05pm

विरोधों में जो जले वो मशाल है 

विरोधियों में जो लिखे वो कलम का लाल है |

हर बार की तरह इस बार भी गागर में सागर |लेखक की मनोदशा और उसकी सफ़लता का इतना सफल वर्णन |आप की लेखन-शैली से बहुत प्रभावित हूँ |एक अन्य मित्र निलेश जी हैं जिनकी लम्बी अनुपस्तिथि अखर रही है उम्मीद है वो भी शीघ्र हमारे बीच स्वस्थ होकर लौटेंगे |

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on December 4, 2014 at 10:01pm

आदरणीय गणेश भाईजी,

विष बुझे तीर सी लगती हैं, व्यंग्य कलम की मार।

तिलमिलाते नेता अफसर, जो हैं भ्रष्ट गद्दार ॥

हार्दिक बधाई लघु कथा की।  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 4, 2014 at 8:43pm

नेता लोग किसी और चीज से इतना नहीं डरते जितना अखबार से डरते हैं .....उस पर कविता भी ऐसी ....तो धमकियाँ ही तो देना जानते हैं बढ़िया कटाक्ष के साथ एक लेखक की मनोदशा को भी भलिभांति दर्शाया है लघु कथा में ...बहुत ही उत्कृष्ट लघु कथा बनी ही \हार्दिक बधाई आ० गणेश जी 

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