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गजल- वो लफ़्ज लफ़्ज गद्दार रखनी है

2212 122 1222

हर शेर में ये दरकार रखनी है!
वो बेवफा तो हर बार रखनी है!!

अशआर शेर अशआर रखनी है!
वो लफ़्ज लफ़्ज गद्दार रखनी है!!

जब तक वो खुदखुशी कर न ले मुझको!
हर लफ़्ज एक तलवार रखनी है!!

बीमार हूँ तो हँस कर दिखाऊं क्यूं!
ये नज़्म भी तो बीमार रखनी है!!

तू मर अभी नहीं सकता ऐ'राहुल'!
के बात और दो चार रखनी है!!


मौलिक व अप्रकाशित!

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Comment by Rahul Dangi Panchal on December 16, 2014 at 10:11am
नाम बताने का कष्ट करेंगे
Comment by Rahul Dangi Panchal on December 16, 2014 at 10:10am
आदरणीय गिरीराज जी सादर धन्यवाद पर क्या आप मुझे मेरी इस गजल की बहर का नाम बताने का करेंगे प्लीज !

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 16, 2014 at 9:40am

आदरणीय राहुल भाई , गज़ल का प्रयास अच्छा है , आ. मिथिलेश भाई जी से सहमत हूँ , कई अशआर मे बात साफ नही कह पाये हैं । गज़ल समय चाहती थी  ऐसा लगता है ।

Comment by Rahul Dangi Panchal on December 13, 2014 at 9:23pm
धन्यवाद मिथिलेश जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 13, 2014 at 7:32pm

हर शेर में ये दरकार रखनी है!
वो बेवफा तो हर बार रखनी है!! ... कहन स्पष्ट नहीं हो पा रही है 

अशआर शेर अशआर रखनी है!
वो लफ़्ज लफ़्ज गद्दार रखनी है!! इसका मतलब समझ नहीं आया 

अच्छा प्रयास है  बधाई 

Comment by Rahul Dangi Panchal on December 13, 2014 at 10:41am
बहुत बहुत धन्यवाद! श्याम नारायण जी सादर!
Comment by Shyam Narain Verma on December 13, 2014 at 10:27am

बहुत सुंदर गज़ल। बधाई।

Comment by Rahul Dangi Panchal on December 12, 2014 at 10:53pm
बहुत बहुत आभारी हुँ भाई नीरज जी आपका! परन्तु दंगी नहीं दांगी हाहाहा...
Comment by Neeraj Nishchal on December 12, 2014 at 9:58pm
भाई बहुत खूब गज़ल राहुल दंगी जी बधाई ।
Comment by Rahul Dangi Panchal on December 12, 2014 at 9:05pm
गुमनाम जी सादर आभार !

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