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"सीमा, अपनी बारहवीं से आगे की पढ़ाई पूरी कर लो। कुछ बन जाओगी तो कामयाब हो जाओगी।"
"मुझे कामयाब होकर क्या करना है भगवान का दिया सबकुछ तो है हमारे पास।"- सीमा ने सौरभ को यही जवाब दिया था।
काल का ऐसा चक्र चला सौरभ इस दुनिया को अलविदा कह गया। पार्टनर भाई ने सारे बिजनेस पर धीरे-धीरे कब्जा कर लिया।
"निशा, अब हमारा क्या होगा? मेरे तो बच्चे भी छोटे-छोटे हैं उनका पालन-पोषण कैसे करूँगी? जेठ जी से कहकर थोड़ा काम दिलवा दो ना।"
"देख सीमा, तुमको तो पता ही है अब मुझसे घर का काम बनता नहीं है अगर तुम सब काम संभाल लो तो किसी बाहर वाले को पैसा देने की बजाय तुमको दे दिया करेंगे।"
आज सीमा अपनी गलती पर पछता रही थी। अगर सौरभ की बातों को गंभीरता से लेती तो उसकी स्थिति इतनी दयनीय नहीं होती।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 21, 2014 at 6:16pm

अच्छी लघुकथा साझा की आपने. बधाई आदरणीय


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 21, 2014 at 12:06pm

लघुकथा के माध्यम से अच्छा संदेश दिया आपने , बधाई , आदरणीय ॥

Comment by somesh kumar on December 20, 2014 at 7:38pm

समय पर चेतो वरना रोओं ,ऐसा भाव जो की एक यथार्थ समाजिक -घटना है |लघुकथा पर बधाई 

Comment by Hari Prakash Dubey on December 20, 2014 at 6:41pm

आदरणीय विनोद जी ,इस लघुकथा पर बधाई आपको !

Comment by Shyam Narain Verma on December 19, 2014 at 12:34pm

बहुत बेहतर लघुकथा. बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 19, 2014 at 12:27pm

अच्छी लघुकथा.... बधाई आपको 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 19, 2014 at 10:34am

मित्र

लघु कथा में मितव्ययता आवश्यक है i अंतिम पंक्ति के बिना भी कथा चंगी थी i  सादर i

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