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"ये दुनिया तब सच्ची थी जब आप जिंदा थे या अब सच्ची है पापा? हर रिश्ता-नाता झूठा ही लग रहा है अंकल की हिम्मत तो देखिए आज मुझे दिलासा देने के बहाने कई जगह से छुआ। आप हमें छोड़कर क्यों चले गए पापा ये दुनिया बहुत गंदी है।"
"सीमा, मेरी प्यारी बेटी रो मत। भेड़ों के लबादे में भेड़िए हैं सारे के सारे। अपने पापा की एक बात याद रखना ये भेड़िए उन्हीं को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करते हैं जो कमजोर होते हैं इसलिए हमेशा खुद को मजबूत रखना मजबूर नहीं।"- सीमा की जब आँखें खुली तो ऐसा लग रहा था जैसे हिम्मत के रूप में अब पापा उसके साथ ही हैं।


मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by somesh kumar on December 19, 2014 at 11:51pm

यही आईना है भेड़े की शक्ल में सारे भेड़िए ,खुद को महफूज करना होगा अपनी हिम्मत से ,सुंदर अर्थपूर्ण लघुकथा भाई जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 18, 2014 at 8:03pm

बहुत मार्मिक लघुकथा अच्छी सकारात्मक सन्देश के साथ ...बधाई आपको 

Comment by gumnaam pithoragarhi on December 18, 2014 at 6:16pm

बहुत खूब है सर वाकई हमें अपना बचाव खुद ही करना होगी

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 18, 2014 at 6:14pm

हिम्मत किसी रूप में मिले हिम्मत है  i हिम्मते मरदाँ मददे खुदा  i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 18, 2014 at 12:24pm
सकारात्मक सन्देश देती लघुकथा। समस्या भी और समाधान भी। इतने प्रभावकारी रूप में। बधाई इस इस रचना हेतु आदरणीय विनोद जी
Comment by Hari Prakash Dubey on December 18, 2014 at 11:50am

"हमेशा खुद को मजबूत रखना मजबूर नहीं" आपकी रचना का मर्म सुन्दर है ,बधाई आदरणीय विनोद जी !

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