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ये खुशियाँ , ये गम --- डा० विजय शंकर

दुःख तो हम कितने ही झेल जाते हैं ,
ये तो खुशियाँ हैं जो संभाले नहीं संभाली जाती हैं।

ये दर्द हैं , दुःख है जो हम हमेशा छुपा ले जाते हैं ,
बस ये खुशियाँ हैं जो हर बार चेहरे पे आ जाती हैं।

हम खुशियों को लोगों में बाँटने की बात करते हैं ,
लोग जाने कैसे हैं , लोगों को ही बाँट लेते हैं ।

दुःख दर्द कितने अपने हैं , छिपाओ तो बस छिपे रहते हैं ,
खुशियां गैर ,परायी , बेमुर्रव्वत हैं ,जाहिर हो जाती हैं |

खुशियाँ हैं ,आती हैं ,जाती हैं, कितनी देर टिक पाती हैं ,
गम हैं, आ गए एक बार तो जाना कहाँ , साथ रहते हैं॥



मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर

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Comment by Dr. Vijai Shanker on December 27, 2014 at 8:37pm
प्रिय जीतेन्द्र जी, प्रयास तो यही रहता है कि पढ़नेवाले कुछ सोंचें , पढ़े और खोये नहीं। आप कुछ सोचतें हैं , रचना को एक सार्थकता मिलती है।
प्रशस्ति, बधाइयों के लिए ह्रदय से धन्यवाद, सादर।
नव वर्ष आपको , सपरिवार शुभ एवं मंगलमय हो.
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 27, 2014 at 12:14pm

सर. आपकी रचनाओं को पढ़कर, मन में कई सवाल खड़े हो जाते है. यह सच्चाई ,सब आपके अनुभव को उजागर करती हैं.

बहुत-बहुत बधाई,सर . नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

सादर! 

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 27, 2014 at 9:09am
आपकी उपस्थिति , वह भी प्रशस्ति के साथ , बहुत बहुत धन्यवाद , आदरणीय डॉ o गोपाल नारायण जी, सादर।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 26, 2014 at 11:56am

कई सत्य दर्शाती  भाव की सबलता लिए एक अच्छी अभिव्यक्ति  i

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 26, 2014 at 11:34am
रचना को कहीं से स्वयं को जोड़ लेने से जो हौसला बढ़ा है, आदरणीय सोमेश जी , वही बहुत बड़ी प्रशस्ति है, ह्रदय से आभार , सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on December 26, 2014 at 11:30am
पंक्तियाँ आपको पसंद आईं , अच्छा लगा , बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी, आपकी बधाई हेतु ह्रदय से आभार, सादर.
Comment by Dr. Vijai Shanker on December 26, 2014 at 11:28am
रचना के भावों को मान देने एवं बधाई हेतु ह्रदय से धन्यवाद, इंजी o गणेश जी बागी जी, सादर।
Comment by Dr. Vijai Shanker on December 26, 2014 at 11:25am
आदरणीय योगेन्द्र सिंह जी, रचना के भावों को स्वीकार करने एवं बधाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, सादर।
Comment by somesh kumar on December 25, 2014 at 11:13pm

हम खुशियों को लोगों में बाँटने की बात करते हैं ,
लोग जाने कैसे हैं , लोगों को ही बाँट लेते हैं ।

पूरी रचना में ही सुंदर भाव हैं |जो मुझे अच्छा लगा वो अलग कर लिया यानि अपने हिस्से की भावना 

Comment by Hari Prakash Dubey on December 25, 2014 at 6:22pm

आदरणीय .डा० विजय शंकर सर .....ये तो खुशियाँ हैं जो संभाले नहीं संभाली जाती हैं....क्या बात कह दी आपने ..सुन्दर रचना पर हार्दिक बधाई !

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