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ऐ कवि-शायर! कहाँ तुम छिप कर बैठे हो. ज़रा बाहर निकल कर देख तेरी कल्पना क्या है.
कहाँ निर्भीक वह यौवन, जिसे तुम शोख कहते हो.
कहाँ जलता हुआ सौन्दर्य, जिसको ज्योति कहते हो .
कहाँ कंचनमयी काया, कहाँ है जुल्फ बादल सा.
किधर चन्दन सा है वह तन, कहाँ है नैन काजल सा.
हाँ देखा है सड़क पर शर्म से झुकती जवानी को, सुना कोठे की मैली सेज पर लुटती जवानी को.
इसी मजबूर यौवन पर लगाकर शब्द का पर्दा, सच्चाई को छिपाने का तेरा यह बचपना है क्या.
ज़रा बाहर निकल कर देख तेरी कल्पना है क्या.
फटें हों बसन जिस तन के, उसे ढंकना बताना क्या.
जो घूँघट लुट चुका उसको, भला पर्दा सिखाना क्या.
करती भूख की खातिर, जो अपने रूप का सौदा.
उस मजबूर बाला को भी, शहनाई सुनाना क्या.
यहाँ पर रहनुमा तन पर धवल खद्दर पहनते हैं, मगर कुरते के नीचे अपनी गंजी मैली रखतें हैं.
अगर मन साफ़ ही ना हो तो फिर संगम नहाना क्या. ज़रा बाहर निकल कर देख तेरी कल्पना है क्या.
फिजा बदली- घटा बदली, ज़मीं बदली- जहां बदला.
हवा ऐसी चली इंसान का, दिल और इमां बदला.
खुदा- भगवान् का अब फैसला, इंसान करता है.
यहाँ मंदिर- वहाँ मस्जिद, इसी मुद्दे पर लड़ता है.
जिस मुल्क में निर्धन- दलित अपमान सहते हैं, जहां खुनी- लुटेरा शान से सरेआम रहते हैं.
मापतपुरी तन्हाई में ये सोच कर देखो, यही इकबाल के सपनों का वो हिन्दोस्तां है क्या.
ज़रा बाहर निकल कर देख तेरी कल्पना है क्या.

गीतकार- सतीश मापतपुरी
मोबाइल- 9334414611

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 9, 2010 at 9:16am
खुदा- भगवान् का अब फैसला, इंसान करता है.
यहाँ मंदिर- वहाँ मस्जिद, इसी मुद्दे पर लड़ता है.
जिस मुल्क में निर्धन- दलित अपमान सहते हैं, जहां खुनी- लुटेरा शान से सरेआम रहते हैं.
मापतपुरी तन्हाई में ये सोच कर देखो, यही इकबाल के सपनों का वो हिन्दोस्तां है क्या.
ज़रा बाहर निकल कर देख तेरी कल्पना है क्या,

जय हो भाई मापतपुरी , आपके लेखन शैली का मैं कायल हो गया, आपने कल्पना लोक से सीधे जमीं पर लाकर रख दिया है, बहुत ही सही कह रहे है, कल्पना और हकीक़त मे फर्क तो हई है, बहुत ही यथार्थ खयालात है सतीश भईया , बहुत बढ़िया,
Comment by Kanchan Pandey on June 8, 2010 at 3:31pm
Atulniya, atulniya hai yey kavita , bahut hi sunder aur sachhai key najdik,
Comment by Admin on June 8, 2010 at 2:30pm
हाँ देखा है सड़क पर शर्म से झुकती जवानी को,
सुना कोठे की मैली सेज पर लुटती जवानी को.
इसी मजबूर यौवन पर लगाकर शब्द का पर्दा,
सच्चाई को छिपाने का तेरा यह बचपना है क्या.
ज़रा बाहर निकल कर देख तेरी कल्पना है क्या.

मापतपुरी जी एक बेहतरीन कविता का दीदार आपने करा दिया आपने , कविता का शीर्षक भले ही कल्पना है पर आपने यथार्थ की धरती पर इस कविता को प्लोटिंग किया है, एक कवि के ह्रदय की चीत्कार बिलकुल स्पस्ट रूप से आपकी कविता मे दिख रहा है, इस खुबसूरत रचना के लिये बधाई स्वीकार करे सतीश भैया,

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 7, 2010 at 8:06pm
सतीश भाई आनंद आ गया आपकी कविता पढ़कर - बहुत ही ग़ज़ब का लिखा है !
//यहाँ पर रहनुमा तन पर धवल खद्दर पहनते हैं,
मगर कुरते के नीचे अपनी गंजी मैली रखतें हैं//
वाह वाह वाह - झिंझोड़ कर रख देती है आपकी यह कविता ! में दिल से आपको इस सुंदर कविता के लिए मुबारकबाद देता हूँ !
Comment by Rash Bihari Ravi on June 7, 2010 at 6:58pm
यहाँ पर रहनुमा तन पर धवल खद्दर पहनते हैं, मगर कुरते के नीचे अपनी गंजी मैली रखतें हैं.
अगर मन साफ़ ही ना हो तो फिर संगम नहाना क्या. ज़रा बाहर निकल कर देख तेरी कल्पना है क्या.
फिजा बदली- घटा बदली, ज़मीं बदली- जहां बदला.
हवा ऐसी चली इंसान का, दिल और इमां बदला.
खुदा- भगवान् का अब फैसला, इंसान करता है.
यहाँ मंदिर- वहाँ मस्जिद, इसी मुद्दे पर लड़ता है.
bahut badhia ................................................................mere pas sabd hi nahi hain kya likhu,
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on June 7, 2010 at 6:57pm
हवा ऐसी चली इंसान का, दिल और इमां बदला.
खुदा- भगवान् का अब फैसला, इंसान करता है.
यहाँ मंदिर- वहाँ मस्जिद, इसी मुद्दे पर लड़ता है.

bahut hi badhiya likha hai aapne satish jee.....aur main rana jee ki bhi baat se purn roop se sahmat hoon

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on June 7, 2010 at 5:37pm
बहुत सुन्दर... गहरे सरोकारों का विषय चुना है मपतपुरी भैया आपने.........जो हमें खुली आँखों से नहीं दिखता है, असल में ऑंखें बंद करने के बाद स्पष्ट हो जाता है. ऐसे ही यथार्थ का उद्घाटन करती हुई इस रचना को लिखने के लिए साधुवाद स्वीकार करें!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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